दिन 41

जीवन बदल देने वाले वचन

बुद्धि भजन संहिता 19:7-14
नए करार मत्ती 26:47-68
जूना करार निर्गमन 6:13-8:32

परिचय

मेरे पिता मरने के पहले रूस जाना चाहते थे। हम एक परिवार के रूप में वहाँ गए थे। उस समय वहाँ पर बाइबल ले जाना सख्ती से गैरकानूनी था। मैं अपने साथ कुछ रूसी भाषा में लिखी बाइबल ले गया। जब मैं वहाँ पर था तो मैं चर्चों में गया और मैंने उन लोगों की तलाश की जो सच में मसीही थे। (अक्सर चर्च की मीटिंग्स में के.जी.बी. द्वारा गुसपैठ की जाती थी)।

एक अवसर पर, सभा के बाद रास्ते में एक आदमी ने मेरा पीछा किया। मैं उसके पास गया और उसकी पीठ पर थपथपाया। वहाँ कोई नहीं था। मैंने एक बाइबल निकाली और उसे दे दी। एक पल के लिए, उसकी अभिव्यक्ति लगभग अविश्वसनीय थी। तब उसने अपनी जेब से नये नियम की एक पुस्तक निकाली, जो कि लगभग 100 साल पुरानी थी। पन्ने इतने घिस गए थे कि वे पारदर्शी नज़र आ रहे थे। जब उसने जाना कि उसे एक संपूर्ण बाइबल मिली है, तो वह प्रफुल्लित हो गया, उसने ना ही कुछ अँग्रेज़ी में कहा और ना ही रूसी भाषा में कहा। लेकिन हमने एक दूसरे को गले लगाया और वह रास्ते में खुशी के मारे कूदने लगा।

यह उसके लिए ऐसा था जैसे दाऊद के लिए भजन संहिता, परमेश्वर का वचन शुद्ध सोने से भी कीमती है; ये मधु से भी मीठे हैं (भजन संहिता 19:10)।

परमेश्वर के वचन इतने कीमती क्यों हैं? यीशु ने कहा है: ‘मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है जीवित रहेगा’ (मत्ती 4:4)।

बुद्धि

भजन संहिता 19:7-14

7 यहोवा की शिक्षायें सम्पूर्ण होती हैं,
 ये भक्त जन को शक्ति देती हैं।
 यहोवा की वाचा पर भरोसा किया जा सकता हैं।
 जिनके पास बुद्धि नहीं है यह उन्हैं सुबुद्धि देता है।
8 यहोवा के नियम न्यायपूर्ण होते हैं,
 वे लोगों को प्रसन्नता से भर देते हैं।
 यहोवा के आदेश उत्तम हैं,
 वे मनुष्यों को जीने की नयी राह दिखाते हैं।

9 यहोवा की आराधना प्रकाश जैसी होती है,
 यह तो सदा सर्वदा ज्योतिमय रहेगी।
 यहोवा के न्याय निष्पक्ष होते हैं,
 वे पूरी तरह न्यायपूर्ण होते हैं।
10 यहोवा के उपदेश उत्तम स्वर्ण और कुन्दन से भी बढ़ कर मनोहर है।
 वे उत्तम शहद से भी अधिक मधुर हैं, जो सीधे शहद के छते से टपक आता है।
11 हे यहोवा, तेरे उपदेश तेरे सेवक को आगाह करते है,
 और जो उनका पालन करते हैं उन्हें तो वरदान मिलते हैं।

12 हे यहोवा, अपने सभी दोषों को कोई नहीं देख पाता है।
 इसलिए तू मुझे उन पापों से बचा जो एकांत में छुप कर किये जाते हैं।
13 हे यहोवा, मुझे उन पापों को करने से बचा जिन्हें मैं करना चाहता हूँ।
 उन पापों को मुझ पर शासन न करने दे।
 यदि तू मुझे बचाये तो मैं पवित्र और अपने पापों से मुक्त हो सकता हूँ।
14 मुझको आशा है कि, मेरे वचन और चिंतन तुझको प्रसन्न करेंगे।
 हे यहोवा, तू मेरी चट्टान, और मेरा बचाने वाला है!

समीक्षा

परमेश्वर के वचन को आपका जीवन बदलने दें

हमें अनेक तरीकों में परमेश्वर के वचन की परिवर्तित कर देने वाली सामर्थ की ज़रूरत है। चाहें आप तनावपूर्ण और जटिल परिस्थितियों में जब निराश हों तब आप बुद्धि और प्रोत्साहन की तलाश में हैं या आगे बढ़ने के लिए मार्गदर्शन चाह रहे हैं, बाइबल के पन्नों में आप मदद पा सकते हैं।

दाऊद के पास उतनी बाइबल नहीं थी जितनी आपके पास हैं। लेकिन उसके पास 'प्रभु की व्यवस्था थी' (पद - 7अ), 'और प्रभु के नियम थे' (पद - 7ब), 'प्रभु के सिद्ध उपदेश थे' (पद - 8अ), और 'प्रभु का भय था' (पद - 9ब)।

वह इन वचनों का उल्लेख 'सिद्ध' (पद - 7अ), 'पवित्र' (पद - 9अ), और 'मूल्यवान' (पद - 10अ) के रूप में करते हैं।

इस भजन में हम बाइबल पठन के जीवन-बदल देने वाले प्रभावों को देखते हैं। जो कि इस प्रकार हैं:

  1. आपके प्राण को बहाल करता है (पद - 7अ)।
  2. आप में बुद्धि लाता है (पद - 7ब)।
  3. आपके हृदय को आनंदित करता है (पद - 8अ)।
  4. आपकी आंखों में ज्योति लाता है (पद - 8ब)।
  5. आपको खतरे की चेतावनी देता है (पद - 11अ)।
  6. आपको बड़ा प्रतिफल देता है (पद - 11ब)।

बाइबल पढ़ने और प्रार्थना करने का बहुत करीबी संबंध है। सिर्फ जानकारी प्राप्त करने के लिए बाइबल मत पढ़िये, बल्कि यह सुनने के लिए कि परमेश्वर आप से क्या कह रहे हैं। इसके प्रति स्वाभाविक प्रतिक्रिया ही प्रार्थना है। यह दो तरफा प्रक्रिया है। इसलिए हम इस बाइबल के हर एक भाग को प्रार्थना के साथ एक साल में समाप्त करने की कोशिश करते हैं, उस बारे में प्रतिक्रिया करते हुए जो परमेश्वर ने हमें अपने वचनों के द्वारा दिखाया है। दाऊद परमेश्वर के वचन के महत्त्व का गुणगान करते हुए अद्भुत प्रार्थना में जाते हैं। दाऊद की प्रार्थना मेरी प्रार्थना है (पद - 12-14)

प्रार्थना

प्रभु, 'मेरे गुप्त पापों को क्षमा कीजिये। अपने दास को ढिठाई के पापों से भी बचाए रखिये; ये मुझ पर प्रभुता न करने पाएं…. हे प्रभु, मेरी चट्टान और मेरे उद्धार, मेरे मुंह के वचन और मेरे हृदय का ध्यान आपके सम्मुख ग्रहण योग्य हों

नए करार

मत्ती 26:47-68

यीशु को बंदी बनाना

47 यीशु जब बोल ही रहा था, यहूदा जो बारह शिष्यों में से एक था, आया। उसके साथ तलवारों और लाठियों से लैस प्रमुख याजकों और यहूदी नेताओं की भेजी एक बड़ी भीड़ भी थी। 48 यहूदा ने जो उसे पकड़वाने वाला था, उन्हें एक संकेत देते हुए कहा कि जिस किसी को मैं चूमूँ वही यीशु है, उसे पकड़ लो, 49 फिर वह यीशु के पास गया और बोला, “हे गुरु!” और बस उसने यीशु को चूम लिया।

50 यीशु ने उससे कहा, “मित्र जिस काम के लिए तू आया है, उसे कर।”

फिर भीड़ के लोगों ने पास जा कर यीशु को दबोच कर बंदी बना लिया। 51 फिर जो लोग यीशु के साथ थे, उनमें से एक ने तलवार खींच ली और वार करके महायाजक के दास का कान उड़ा दिया।

52 तब यीशु ने उससे कहा, “अपनी तलवार को म्यान में रखो। जो तलवार चलाते हैं वे तलवार से ही मारे जायेंगे। 53 क्या तुम नहीं सोचते कि मैं अपने परम पिता को बुला सकता हूँ और वह तुरंत स्वर्गदूतों की बारह सेनाओं से भी अधिक मेरे पास भेज देगा? 54 किन्तु यदि मैं ऐसा करूँ तो शास्त्रों की लिखी यह कैसे पूरी होगी कि सब कुछ ऐसे ही होना है?”

55 उसी समय यीशु ने भीड़ से कहा, “तुम तलवारों, लाठियों समेत मुझे पकड़ने ऐसे क्यों आये हो जैसे किसी चोर को पकड़ने आते हैं? मैं हर दिन मन्दिर में बैठा उपदेश दिया करता था और तुमने मुझे नहीं पकड़ा। 56 किन्तु यह सब कुछ घटा ताकि भविष्यवक्ताओं की लिखी पूरी हो।” फिर उसके सभी शिष्य उसे छोड़कर भाग खड़े हुए।

यहूदी नेताओं के सामने यीशु की पेशी

57 जिन्होंने यीशु को पकड़ा था, वे उसे कैफ़ा नामक महायाजक के सामने ले गये। वहाँ यहूदी धर्मशास्त्री और बुजुर्ग यहूदी नेता भी इकट्ठे हुए। 58 पतरस उससे दूर-दूर रहते उसके पीछे-पीछे महायाजक के आँगन के भीतर तक चला गया। और फिर नतीजा देखने वहाँ पहरेदारों के साथ बैठ गया।

59 महायाजक समूची यहूदी महासभा समेत यीशु को मृत्यु दण्ड देने के लिए उसके विरोध में कोई अभियोग ढूँढने का यत्न कर रहे थे। 60 पर ढूँढ नहीं पाये। यद्यपि बहुत से झूठे गवाहों ने आगे बढ़ कर झूठ बोला। अंत में दो व्यक्ति आगे आये 61 और बोले, “इसने कहा था कि मैं परमेश्वर के मन्दिर को नष्ट कर सकता हूँ और तीन दिन में उसे फिर बना सकता हूँ।”

62 फिर महायाजक ने खड़े होकर यीशु से पूछा, “क्या उत्तर में तुझे कुछ नहीं कहना कि वे लोग तेरे विरोध में यह क्या गवाही दे रहे हैं?” 63 किन्तु यीशु चुप रहा।

फिर महायाजक ने उससे पूछा, “मैं तुझे साक्षात परमेश्वर की शपथ देता हूँ, हमें बता क्या तू परमेश्वर का पुत्र मसीह है?”

64 यीशु ने उत्तर दिया, “हाँ, मैं हूँ। किन्तु मैं तुम्हें बताता हूँ कि तुम मनुष्य के पुत्र को उस परम शक्तिशाली की दाहिनी ओर बैठे और स्वर्ग के बादलों पर आते शीघ्र ही देखोगे।”

65 महायाजक यह सुनकर इतना क्रोधित हुआ कि वह अपने कपड़े फाड़ते हुए बोला, “इसने जो बातें कही हैं वे परमेश्वर की निन्दा में जाती हैं। अब हमें और गवाह नहीं चाहिये। तुम सब ने परमेश्वर के विरोध में कहते, इसे सुना है। 66 तुम लोग क्या सोचते हो?”

उत्तर में वे बोले, “यह अपराधी है। इसे मर जाना चाहिये।”

67 फिर उन्होंने उसके मुँह पर थूका और उसे घूँसे मारे। कुछ ने थप्पड़ मारे और कहा, 68 “हे मसीह! भविष्यवाणी कर कि वह कौन है जिसने तुझे मारा?”

समीक्षा

परमेश्वर के वचनों से मार्गदर्शित हों**

यीशु ने स्पष्ट रूप से और सावधानी से वचनों का अध्ययन किया था। उनका पूरा जीवन उसी में ढला था जो उन्होंने पढ़ा था। यह पवित्र शास्त्र के उनके पठन से आता है और जब उन्हें गिरफ्तार किया गया था तब वह समझ गए थे कि उनके साथ क्या हो रहा है। उनके साथियों ने विरोध करने की कोशिश की लेकिन यीशु ने कहा, '….. परन्तु पवित्र शास्त्र की वे बातें कि ऐसा ही होना अवश्य है, क्योंकर पूरी होंगी?’ (पद - 54)। वह भीड़ को समझाते हैं कि, '…. परन्तु यह सब इसलिये हुआ है, कि भविष्यद्वक्ताओं के वचन पूरे हों' (पद - 56)।

यह वचन ही थे जिसने उन्हें विश्वासघात, परित्याग और गलत दोष से निपटने की क्षमता दी। उन्होंने उदाहरण स्थापित किया है कि आप अपने जीवन की इन परिस्थितियों से कैसे निपट सकते हैं।

1. विश्वासघात

यहूदा ने अपने प्यार का इज़हार यीशु को चूमकर किया।

2. परित्याग

उनके सभी मित्र उन्हें 'छोड़कर भाग गए' (पद - 56ब)। विजय के पलों में (जब लोग व्यस्त हो जाते हैं, उनके कोई बच्चा होता है या उन्होंने परीक्षा में अच्छा किया होता है) तो यह स्वाभाविक है कि वे उनके साथ संबंध बनाना और उनके आसपास रहना चाहते हैं। लेकिन विश्वासयोग्यता का मतलब लोगों को उस समय भी सहारा देना होता है जब वे परेशानी में होते हैं। ऐसे में क्या कहना है ज़्यादा मुश्किल होता है और उनसे अलग होने की और वास्तव में उन्हें छोड़ देने की इच्छा भी होती है।

ऐसा कहा है, 'जब आप जीवन के चढ़ाव में होते हैं, तब आपके दोस्तों को पता चलता है कि आप कौन हैं। जब आप जीवन के उतार में होते हैं, तब आपको पता चलता है कि आपके दोस्त कौन हैं!'

3. गलत आरोप

क्या कभी आप पर गलत आरोप लगे हैं? यह काफी भयंकर अनुभव है। यीशु ने उनके विरोध में गलत गवाही पर भयंकर अन्याय का सामना किया जिसकी वजह से वे उन्हें जान से भी मार सकते थे (पद - 59)।

उन पर असाधारण क्रूरता की गई। तब भी उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया (पद - 67) और उन्होंने बहस में न जीतने का फैसला किया बल्कि युद्ध जीतने का फैसला किया (अल्फा पर आयोजित किये गए छोटे समूह के लीडर्स इसे याद रखें!) उन्होंने वचन से जान लिया था कि इसका कोई उद्देश्य है और यह अंत में उन्हें महान विजय दिलाएगा।

खुद की पहचान और उनके मिशन के बारे में यीशु की स्पष्ट समझ उनके द्वारा किये गए परमेश्वर के वचन के अध्ययन से आई थी। महायाजक के सामने उनके फैसले के समय यीशु एक असहाय पीड़ित नज़र आए, वास्तव में उन्होंने प्रगट किया कि वे एक नया मंदिर बनाने वाले (पद - 61), मसीहा (पद - 63), परमेश्वर के पुत्र (पद - 63), और मनुष्य के पुत्र हैं जो परमेश्वर के दाहिनी हाथ पर विराजमान होंगे (पद - 64)।वास्तव में, सभी अधिकार और शक्ति के साथ वह एक असहाय शिकार है।

'मनुष्य का पुत्र' होने का संदर्भ वास्तव में दानिएल 7:13 से लिया गया उद्धरण है। यीशु समझ गए थे कि यह उनके ही बारे में एक मसीही वायदा है, जो उन पर आने वाली तकलीफों, उनके अनुमोदन को और उन्हें परमेश्वर द्वारा दिये गए अधिकार को दर्शाता है।

विडंबना यह है कि स्वयं न्यायधीश की परीक्षा हो रही थी। उनकी तरह, हम सभी को तय करना है कि हम यीशु के बारे में क्या सोचते हैं (मत्ती 26:66)।

प्रार्थना

प्रभु, मुझे यीशु के आदर्शों का अनुसरण करने में मदद कीजिये कि मैं परमेश्वर के वचनों को पढ़ूँ और उन्हें अपने जीवन में लागू करूँ।

जूना करार

निर्गमन 6:13-8:32

13 किन्तु यहोवा ने मूसा और हारून से बातचीत की। परमेश्वर ने उन्हें जाने और इस्राएल के लोगों से बातें करने का आदेश दिया और यह भी आदेश दिया कि वे जाएँ और फ़िरौन से बातें करें। परमेश्वर ने आदेश दिया कि वे इस्राएल के लोगों को मिस्र के बाहर ले जाएं।

इस्राएल के कुछ परिवार

14 इस्राएल के परिवारों के प्रमुख लोगों के नाम है:

इस्राएल के पहले पुत्र रूबेन के चार पुत्र थे। वे थे हनोक, पल्लु, हेस्रोन और कर्म्मी।

15 शिमोन के पुत्र थे: यमूएल, यामीन, ओहद, याकीन सोहर और शाउल। (शाउल एक कनानी स्त्री का पुत्र था।)

16 लेवी एक सौ सैंतीस वर्ष जीवित रहा। लेवी के पुत्र थे गेर्शोन, कहात और मरारी।

17 गेर्शोन के दो पुत्र थे—लिबनी और शिमी।

18 कहात एक सौ तैंतीस वर्ष जीवित रहा। कहात के पुत्र थे अम्राम, यिसहार, हेब्रोन और उज्जीएल।

19 मरारी के पुत्र थे महली और मूशी।

ये सभी परिवार इस्राएल के पुत्र लेवी के थे।

20 अम्राम एक सौ सैंतीस वर्ष जीवित रहा। अम्राम ने अपने पिता की बहन योकेबेद से विवाह किया। अम्राम और योकेबेद ने हारून और मूसा को जन्म दिया।

21 यिसहार के पुत्र थे कोरह नेपग और जिक्री।

22 उज्जीएल के पुत्र थे मीशाएल एलसापान और सित्री।

23 हारून ने एलीशेबा से विवाह किया। (एलीशेबा अम्मीनादाब की पुत्री थी और नहशोन की बहन।) हारून और एलीशेबा ने नादाब, अबीहू, एलाजार, और ईतामार को जन्म दिया।

24 कोरह के पुत्र (अर्थात् कोरही थे) अस्सीर एलकाना और अबीआसाप।

25 हारून के पुत्र एलाजार ने पूतीएल की पुत्री से विवाह किया और उन्होंने पीनहास को जन्म दिया।

ये सभी लोग इस्राएल के पुत्र लेवी से थे।

26 इस प्रकार हारून और मूसा इसी परिवार समूह से थे और ये ही वे व्यक्ति हैं जिनसे परमेश्वर ने बातचीत की और कहा, “मेरे लोगों को समूहों में बाँटकर मिस्र से निकालो।” 27 हारून और मूसा ने ही मिस्र के राजा फ़िरौन से बातचीत की। उन्होंने फ़िरौन से कहा कि वह इस्राएल के लोगों को मिस्र से जाने दे।

यहोवा का मूसा को फिर बुलावा

28 मिस्र देश में परमेश्वर ने मूसा से बातचीत की। 29 उसने कहा, “मैं यहोवा हूँ। मिस्र के राजा से वे सारी बातें कहो जो मैं तुमसे कहता हूँ।”

30 किन्तु मूसा ने उत्तर दिया, “मैं अच्छा वक्ता नहीं हूँ। राजा मेरी बात नहीं सुनेगा।”

7यहोवा ने मूसा से कहा, “मैं तुम्हारे साथ रहूँगा। फ़िरौन के लिए तुम एक महान राजा की तरह होगे और हारून तुम्हारा अधिकृत वक्ता होगा। 2 जो आदेश मैं दे रहा हूँ वह सब कुछ हारून से कहो। तब वह वे बातें जो मैं कह रहा हूँ, फ़िरौन से कहेगा और फ़िरौन इस्राएल के लोगों को इस देश से जाने देगा। 3 किन्तु मैं फ़िरौन को हठी बनाऊँगा। वह उन बातों को नहीं मानेगा जो तुम कहोगे। तब मैं मिस्र में बहुत से चमत्कार करूँगा। किन्तु वह फिर भी नहीं सुनेगा। 4 इसलिए तब मैं मिस्र को बुरी तरह दण्ड दूँगा और मैं अपने लोगों को उस देश के बाहर ले चलूँगा। 5 तब मिस्र के लोग जानेंगे कि मैं यहोवा हूँ। मैं उनके विरूद्ध हो जाऊँगा, और वे जानेंगे कि मैं यहोवा हूँ। तब मैं अपने लोगों को उनके देश से बाहर ले जाऊँगा।”

6 मूसा और हारून ने उन बातों का पालन किया जिन्हें यहोवा ने कहा था। 7 इस समय मूसा अस्सी वर्ष का था और हारून तिरासी का।

मूसा की लाठी का साँप बनना

8 यहोवा ने मूसा और हारून से कहा, 9 “फ़िरौन तुमसे तुम्हारी शक्ति को प्रमाणित करने के लिए कहेगा। वह तुम्हें चमत्कार दिखाने के लिए कहेगा। तुम हारून से उसकी लाठी जमीन पर फेंकने को कहना। जिस समय फ़िरौन देख रहा होगा तभी लाठी साँप बन जाएगी।”

10 इसलिए मूसा और हारून फ़िरौन के पास गए और यहोवा की आज्ञा का पालन किया। हारून ने अपनी लाठी नीचे फेंकी। फिरौन और उसके अधिकारियों के देखते—देखते लाठी साँप बन गयी।

11 इसलिए फ़िरौन ने अपने गुणी पुरुषों और जादूगरों को बुलाया। इन लोगों ने अपने रहस्य चातुर्य का उपयोग किया और वे भी हारून के समान कर सके। 12 उन्होंने अपनी लाठियाँ ज़मीन पर फेंकी और वे साँप बन गईं। किन्तु हारून की लाठी ने उनकी लाठियों को खा डाला। 13 फ़िरौन ने फिर भी, लोगों का जाना मना कर दिया। यह वैसा ही हुआ जैसा यहोवा ने कहा था। फिरौन ने मूसा और हारून की बात सुनने से मना कर दिया।

पानी का खून बनना

14 तब यहोवा ने मूसा और हारून से कहा, “फ़िरौन हठ पकड़े हुए है। फिरौन लोगों को जाने से मना करता है। 15 सवेरे फ़िरौन नदी पर जाएगा। उसके साथ नील नदी के किनारे—किनारे जाओ। उस लाठी को अपने साथ ले लो जो साँप बनी थी। 16 उससे यह कहो, ‘हिब्रू लोगों के परमेश्वर यहोवा ने हमको तुम्हारे पास भेजा है। यहोवा ने मुझे तुमसे यह कहने को कहा है, मेरे लोगों को मेरी उपासना करने के लिए मरुभूमि में जाने दो। तुमने भी अब तक यहोवा की बात पर कान नहीं दिया है। 17 इसलिए यहोवा कहता है कि, मैं ऐसा करूँगा जिससे तुम जानोगे कि मैं यहोवा हूँ। जो मैं अपने हाथ की इस लाठी को लेकर नील नदी के पानी पर मारुँगा और नील नदी खून में बदल जाएगी। 18 तब नील नदी की मछलियाँ मर जाएंगी और नदी से दुर्गन्ध आने लगेगी। और मिस्री लोग नदी से पानी नहीं पी पाएंगे।’”

19 यहोवा ने मूसा को यह आदेश दिया, “हारून से कहो कि वह नदियों, नहरों, झीलों तथा तालाबों सभी स्थानों पर जहाँ मिस्र के लोग पानी एकत्र करते हैं, अपने हाथ की लाठी को बढ़ाए। जब वह ऐसा करेगा तो सारा जल खून में बदल जाएगा। सारा पानी, यहाँ तक कि लकड़ी और पत्थर के घड़ों का पानी भी, खून में बदल जाएगा।”

20 इसलिए मूसा और हारून ने यहोवा का जैसा आदेश था, वैसा किया। उसने लाठी को उठाया और नील नदी के पानी पर मारा। उसने यह फ़िरौन और उसके अधिकारियों के सामने किया। फिर नदी का सारा जल खून में बदल गया। 21 नदी में मछलियाँ मर गईं और नदी से दुर्गन्ध आने लगी। इसलिए मिस्री नदी से पानी नहीं पी सकते थे। मिस्र में सर्वत्र खून था।

22 जादूगरों ने अपनी जादूगरी दिखाई और उन्होंने भी वैसा ही किया। इसलिए फ़िरौन ने मूसा और हारून को सुनने से इन्कार कर दिया। यह ठीक वैसा ही हुआ जैसा यहोवा ने कहा था। 23 फिरौन मुड़ा और अपने घर चला गया। फ़िरौन ने, मूसा और हारून ने जो कुछ किया, उसकी उपेक्षा की।

24 मिस्री नदी से पानी नहीं पी सकते थे। इसलिए पीने के पानी के लिए उन्होंने नदी के चारों ओर कुएँ खोदे।

मेंढक

25 यहोवा द्वारा नील नदी के बदले जाने के बाद सात दिन बीत गये।

8तब यहोवा ने मूसा से कहा, “फ़िरौन के पास जाओ और उससे कहो की यहोवा यह कहता है, ‘मेरे आदमियों को मेरी उपासना के लिए जाने दो। 2 यदि फ़िरौन उनको जाने से रोकता है तो मैं मिस्र को मेंढ़कों से भर दूँगा। 3 नील नदी मेढ़कों से भर जाएगी। वे नदी से निकलेंगे और तुम्हारे घरों में घुसेंगे। वे तुम्हारे सोने के कमरों और तुम्हारे बिछौनों में होंगे। मेढ़क तुम्हारे अधिकारियों के घरों में, रसोई में और तुम्हारे पानी के घड़ों में होंगे। 4 मेंढ़क पूरी तरह तुम्हारे ऊपर, तुम्हारे लोगों के ऊपर और तुम्हारे अधिकारियों के ऊपर होंगे।’”

5 तब यहोवा ने मूसा से कहा, “हारून से कहो कि वह अपने हाथ की लाठी को नहरों, नदियों और झीलों के उपर उठाए और मेढ़क बाहर निकलकर मिस्र देश में भर जाएँगें।”

6 तब हारून ने मिस्र देश में जहाँ भी जल था उसके ऊपर हाथ उठाया और मेंढ़क पानी से बाहर आने आरम्भ हो गए और पूरे मिस्र को ढक दिया।

7 जादूगरों ने भी वैसा ही किया। वे भी मिस्र देश में मेंढ़क ले आए।

8 फ़िरौन ने मूसा और हारून को बुलाया। फिरौन ने कहा, “यहोवा से कहो कि वे मुझ पर तथा मेरे लोगों पर से मेढ़कों को हटाए। तब मैं लोगों को यहोवा के लिए बलि चढ़ाने को जाने दूँगा।”

9 मूसा ने फिरौन से कहा, “मुझे यह बताएँ कि आप कब चाहते हैं कि मेंढ़क चले जाएँ। मैं आपके लिए, आपके लोगों के लिए तथा आपके अधिकारियों के लिए प्रार्थना करूँगा। तब मेंढ़क आपको और आपके घरों को छोड़ देंगे। मेंढ़क केवल नदी में रह जाएँगे। आप कब चाहते है कि मेंढ़क चले जाएं?।”

10 फिरौन ने कहा, “कल।”

मूसा ने कहा, “जैसा आप कहते हैं वैसा ही होगी। इस प्रकार आप जान जाएंगे कि हमारे परमेश्वर यहोवा के समान कोई अन्य देवता नहीं है। 11 मेंढ़क आपको, आपके घर को, आपके अधिकारियों को और आपके लोगों को छोड़ देंगे। मेंढ़क केवल नदी में रह जाएंगे।”

12 मूसा और हारून फ़िरौन से विदा हुए। मूसा ने उन मेंढ़को के लिए जिन्हें फ़िरौन के विरुद्ध यहोवा ने भेजा था, यहोवा को पुकारा। 13 और यहोवा ने वह किया जो मूसा ने कहा था। मेंढ़क घरों में, घर के आँगनों में और खेतों में मर गए। 14 वे सड़ने लगे और पूरा देश दुर्गन्ध से भर गया। 15 जब फ़िरौन ने देखा कि वे मेंढ़कों से मुक्त हो गए हैं तो वह फिर हठी हो गया। फ़िरौन ने वैसा नहीं किया जैसा मूसा और हारून ने उससे करने को कहा था। वह ठीक वैसा ही हुआ जैसा यहोवा ने कहा था।

जूँएं

16 तब यहोवा ने मूसा से कहा, “हारून से कहो कि वह अपनी लाठी उठाए और जमीन पर की धूल पर मारे। मिस्र में सर्वत्र धूल जूँएं बन जाएंगी।”

17 उन्होंने यह किया। हारून ने अपने हाथ की लाठी को उठाया और जमीन पर धूल में मारा मिस्र में सर्वत्र धूल जूँएं बन गई। जूँएं जानवरों और आदमियों पर छागई।

18 जादूगरों ने अपने जादूओं का उपयोग किया और वैसा ही करना चाहा। किन्तु जादूगर धूल से जूँएं न बना सके। जूएँ जानवरों और आदमियों पर छाई रहीं। 19 इसलिए जादूगरों ने फिरौन से कहा कि परमेश्वर की शक्ति ने ही यह किया है। किन्तु फ़िरौन ने उनकी सुनने से इन्कार कर दिया। यह ठीक वैसा ही हुआ जैसा यहोवा ने कहा था।

मक्खियाँ

20 यहोवा ने मूसा से कहा, “सवेरे उठो और फ़िरौन के पास जाओ। फ़िरौन नदी पर जाएगा। उससे कहो कि यहोवा कह रहा है, ‘मेरे लोगों को मेरी उपासना के लिए जाने दो। 21 यदि तुम मेरे लोगों को नहीं जाने दोगे तो तुम्हारे घरों में मक्खियाँ आएँगी। मक्खियाँ तुम्हारे और तुम्हारे अधिकारियों के ऊपर छा जाएंगी। मिस्र के घर मक्खियों से भर जाएंगे। मक्खियाँ पूरी ज़मीन पर छा जाएंगी। 22 किन्तु मैं इस्राएल के लोगों के साथ वैसा ही बरताव नहीं करूँगा जैसा मिस्री लोगों के साथ करुँगा। जहाँ गेशेन में मेरे लोग रहते हैं वहाँ कोई मक्खी नहीं होगी। इस प्रकार तुम जानोगे कि मैं यहोवा, इस देश में हूँ। 23 अतः मैं कल अपने लोगों के साथ तुम्हारे लोगों से भिन्न बरताव करूँगा। यही मेरा प्रमाण होगा।’”

24 अतः यहोवा ने वही किया, उसने जो कहा झुण्ड की झुण्ड मक्खियाँ मिस्र में आईं। मक्खियाँ फ़िरौन के घर और उसके सभी अधिकारियों के घर में भरी थीं। मक्खियाँ पूरे मिस्र देश में भरी थीं। मक्खियाँ देश को नष्ट कर रही थीं। 25 इसलिए फ़िरौन ने मूसा और हारून को बुलाया। फ़िरौन ने कहा, “तुम लोग अपने परमेश्वर यहोवा को इसी देश में बलियाँ भेंट करो।”

26 किन्तु मूसा ने कहा, “वैसा करना ठीक नहीं होगा। मिस्री सोचते हैं कि हमारे परमेश्वर यहोवा को जानवरों को मार कर बलि चढ़ाना एक भयंकर बात है। इसलिए यदि हम लोग यहाँ ऐसा करते तो मिस्री हमें देखेंगे, वे हम लोगों पर पत्थर फेकेंगे और हमें मार डालेंगे। 27 हम लोगों को तीन दिन तक मरुभूमि में जाने दो और हमें अपने यहोवा परमेश्वर को बलि चढ़ाने दो। यही बात है जो यहोवा ने हम लोगों से करने को कहा है।”

28 इसलिए फ़िरौन ने कहा, “मैं तुम लोगों को जाने दूँगा और मरूभूमि में तुम लोगों के यहोवा परमेश्वर को बलियाँ भेंट करने दूँगा। किन्तु तुम लोगों को ज्यादा दूर नहीं जाना होगा। अब तुम जाओ और मेरे लिए प्रार्थना करो।”

29 मूसा ने कहा, “देखो, मैं जाऊँगा और यहोवा से प्रार्थना करूँगा कि कल वे तुम से, तुम्हारे लोगों से और तुम्हारे अधिकारियों से मक्खियों को हटा ले। किन्तु तुम लोग यहोवा को बलियाँ भेंट करने से मत रोको।”

30 इसलिए मूसा फ़िरौन के पास से गया और यहोवा से प्रार्थना की 31 और यहोवा ने यह किया जो मूसा ने कहा। यहोवा ने मक्खियों को फ़िरौन, उसके अधिकारियों और उसके लोगों से हटा लिया। कोई मक्खी नहीं रह गई। 32 किन्तु फ़िरौन फिर हठी हो गया और उसने लोगों को नहीं जाने दिया।

समीक्षा

परमेश्वर के वचन का पालन करें**

मूसा और हारून ने परमेश्वर के वचनों को सुना और बिल्कुल वैसा ही किया जैसा कि परमेश्वर ने उन्हें करने के लिए कहा था (निर्गमन 7:6)। उन्होंने परमेश्वर के वचन का पालन किया। दूसरी तरफ, इसके विपरीत, फिरौन ने लगातार उनकी आज्ञा को मानने से इंकार किया। उसने ज़िद्द में आकर परमेश्वर के वचन का उल्लंघन किया था।

इतिहास के इस मुकाम पर, शायद मूसा के पास परमेश्वर के लिखित वचन नहीं थे। लेकिन प्रभु ने मूसा से बात की। उसने बार - बार परमेश्वर के वचन सुनें (6:13,28; 7:1,14,19; 8:5,16,20, इत्यादि) और परमेश्वर के निर्देशानुसार किया। परमेश्वर के वचन का मुख्य केन्द्र था, 'परमेश्वर के लोगों को जाने दे, कि वे मेरी उपासना करें' (उदाहरण के लिए 7:16; 8:1; 9:1,13; 10:3)।

हमें अचंभित नहीं होना चाहिये कि 'जादूगर और तंत्र - मंत्र करने वालों' (पद - 7:11, ए.एम.पी.) ने बिल्कुल वैसा ही चमत्कार कर दिखाया जैसा कि मूसा ने किया था (7:22;8:7)। शैतान नकल करने वाला है। वह विनाशकारी चिन्ह प्रदर्शित करने में सक्षम है और बल्कि रचनात्मक चिन्ह भी प्रकट कर सकता है। हमेशा उसका उद्देश्य भरमाना ही है।

आज, परमेश्वर अक्सर पवित्र आत्मा के वरदान के द्वारा कार्य करते हैं जैसे भविष्यवाणी, चंगाई, अन्य भाषा में बोलना और ज्ञान की बातें। सच्चाई यह है कि शैतान भी दूरसंवेदन (टेलीपैथी), आत्मिक - उपचार (स्प्रिच्युलाइज्ड - हीलिंग), या अन्य भाषा बोलने के द्वारा इसकी नकल करने का प्रयास कर सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हमें इन चीज़ों को अनदेखा करना चाहिये – बल्कि हमें उनके बीच फर्क पता करना चाहिये।

हमें पवित्र आत्मा के फल की तरफ ध्यान देना चाहिये। 'तब मिस्र के जादूगरों ने भी अपने तंत्र - मंत्रो से वैसा ही किया; तौभी फिरौन का मन हठीला हो गया,’ (7:22)। इन जादूगरों का प्रभाव निष्पक्ष नहीं था। ये शैतानी थे और इससे फिरौन का दिल परमेश्वर के विरूद्ध और भी कठोर हो गया।

इस पद्यांश से यह स्पष्ट हो गया है कि फिरौन ने अपना मन परमेश्वर के विरूद्ध कठोर कर लिया था, ' उसने फिर अपने मन को कठोर किया, और उनकी न सुनी ' (8:15, पद - 32 भी देखें)। उसी समय उसने वही काटा जो उसने बोया था। परमेश्वर ने उसका मन कठोर कर दिया (7:3)। ये दोनों समपूरक हैं। फिरौन ने अपना मन कठोर किया था जिसके फलस्वरूप परमेश्वर ने उसका मन और भी कठोर कर दिया।

इस पद्यांश में हम देखते हैं कि परमेश्वर लोगों को कितने अवसर देते हैं। मूसा के द्वारा, परमेश्वर ने लगातार फिरौन से बात की। फिरौन के पास प्रतिक्रिया करने के लिए काफी अवसर थे लेकिन अंत में उसने ऐसा करने से इंकार कर दिया। दूसरी तरफ मूसा, परमेश्वर के साथ घनिष्ठता से चलता रहा; अक्सर उनसे प्रार्थना करते हुए (8:12,30) और उनके वचनों को सुनते हुए।

प्रार्थना

प्रभु, मुझे नरम हृदय दीजिये जो आपके वचनों को सुनने के लिए और उनका पालन करने के लिए खुला रहे। आपका धन्यवाद कि उनका पालन करने से महान प्रतिफल मिलता है। मुझे आज मदद कीजिये कि मैं आपके जीवन बदल देने वाले वचनों को केवल सुनने वाला नहीं बल्कि उन्हें कार्य में लाने वाला बनूँ।

पिप्पा भी कहते है

मत्ती 26:53

यह बड़े प्रोत्साहन की बात है कि यीशु के पास 'बारह से भी ज़्यादा स्वर्गदूतों की पलटन थी'। हालाँकि यीशु ने उन्हें उस समय नहीं बुलाया लेकिन उम्मीद है कि अब वे हमारी मदद कर रहे हैं!

दिन का वचन

भजन संहिता – 19:14

"मेरे मुंह के वचन और मेरे हृदय का ध्यान तेरे सम्मुख ग्रहण योग्य हों, हे यहोवा परमेश्वर, मेरी चट्टान और मेरे उद्धार करने वाले!"
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संदर्भ

नोट्स:

जहाँ पर कुछ बताया न गया हो, उन वचनों को पवित्र बाइबल, न्यू इंटरनैशनल संस्करण एन्ग्लिसाइड से लिया गया है, कॉपीराइट © 1979, 1984, 2011 बिबलिका, पहले इंटरनैशनल बाइबल सोसाइटी, हूडर और स्टोगन पब्लिशर की अनुमति से प्रयोग किया गया, एक हॅचेट यूके कंपनी सभी अधिकार सुरक्षित। ‘एनआईवी’, बिबलिका यू के का पंजीकृत ट्रेडमार्क संख्या 1448790 है।

जिन वचनों को (एएमपी, AMP) से चिन्हित किया गया है उन्हें एम्प्लीफाइड® बाइबल से लिया गया है। कॉपीराइट © 1954, 1958, 1962, 1964, 1965, 1987 लॉकमैन फाउंडेशन द्वारा प्राप्त अनुमति से उपयोग किया गया है। (www.Lockman.org)

जिन वचनों को (एमएसजी MSG) से चिन्हित किया गया है उन्हें मैसेज से लिया गया है। कॉपीराइट © 1993, 1994, 1995, 1996, 2000, 2001, 2002. जिनका प्रयोग एनएवीप्रेस पब्लिशिंग ग्रुप की अनुमति से किया गया है।

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