विश्वास
विश्वास मसीही जीवन का आधार है — परन्तु बाइबल विश्वास को किस रूप में परिभाषित करती है? इब्रानियों 11:1 और रोमियों 10:17 पर दिन 316 का मनन।
वचन
“अब विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है।” इब्रानियों 11:1 (हिंदी पवित्र बाइबल, BSI O.V.)
और पौलुस विश्वास की उत्पत्ति को समझाते हुए कहते हैं:
“सो विश्वास सुनने से, और सुनना मसीह के वचन से होता है।” रोमियों 10:17 (हिंदी पवित्र बाइबल, BSI O.V.)
संदर्भ
इब्रानियों 11 बाइबल का “विश्वास का अध्याय” कहलाता है। पहले दस अध्यायों में लेखक यह सिद्ध करता है कि मसीह पुराने नियम की सभी पद्धतियों का पूर्णकर्ता है। फिर अध्याय 11 में वह विश्वासियों की एक श्रृंखला प्रस्तुत करता है — हाबिल, हनोक, नूह, इब्राहीम, सारा, मूसा — सब उस वचन पर भरोसा करते हुए चले जो उन्होंने अभी देखा नहीं था। यही अध्याय 11:1 की परिभाषा का जीवित उदाहरण है।
रोमियों 10 में पौलुस उद्धार के सुसमाचार की चर्चा करता है। वह कहता है कि कोई कैसे विश्वास करेगा यदि उसने सुना नहीं? और कैसे सुनेगा यदि किसी ने प्रचार नहीं किया? इसी क्रम में आता है पद 17 — विश्वास सुनने से उत्पन्न होता है। बाइबल के लिए, विश्वास हवा में पैदा नहीं होता — यह वचन के द्वारा होता है।
अर्थ
विश्वास के तीन प्रमुख पहलू बाइबल में स्पष्ट हैं।
पहला: विश्वास निश्चय है। यूनानी में जो शब्द है (hypostasis) उसका अर्थ है — “नींव” या “आधार।” विश्वास भविष्य में आने वाली वस्तुओं को इतना ठोस मानता है कि वह आज से ही उसकी नींव पर खड़ा हो जाता है। यह अंधा भरोसा नहीं — यह वह दृढ़ता है जो परमेश्वर के वचन के विश्वसनीय होने पर टिकी है।
दूसरा: विश्वास प्रमाण है। “अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण” — यानी, जो दिखाई नहीं देता उसकी पुष्टि। हम भौतिक संसार पर अपनी पाँच इंद्रियों से भरोसा करते हैं; विश्वास हमें एक ऐसी क्षमता देता है जो भौतिक के परे जाकर परमेश्वर की वास्तविकता को पकड़ती है। यह कल्पना नहीं — यह आत्मिक दृष्टि है।
तीसरा: विश्वास सुनने से आता है। यह सबसे व्यावहारिक भाग है। विश्वास कोई व्यक्तित्व का गुण नहीं जो किसी को मिला हो और किसी को नहीं। विश्वास तब बढ़ता है जब मसीह का वचन सुना जाता है, पढ़ा जाता है, स्मरण किया जाता है, और जिया जाता है। पवित्र शास्त्र ही वह उपकरण है जिसके द्वारा परमेश्वर विश्वास का बीज बोते हैं और उसे बढ़ाते हैं।
कैसे लागू करें
- विश्वास के लिए वचन सुनिए। यदि आप विश्वास बढ़ाना चाहते हैं, तो पहले प्रश्न पूछिए — मैं इस सप्ताह कितना परमेश्वर का वचन सुन रहा हूँ? पाठ, उपदेश, बाइबल अध्ययन — विश्वास उसी से बढ़ता है।
- इब्रानियों 11 के नायकों को पढ़िए। एक सप्ताह में एक “विश्वास का नायक” चुनिए और उसकी कहानी पढ़िए। उनकी परिस्थितियाँ कितनी अनिश्चित थीं, और वे फिर भी कैसे चले — यह आपकी आज की चुनौतियों के लिए शक्ति देगा।
- विश्वास से एक छोटा कदम उठाइए। विश्वास निष्क्रिय नहीं — वह कार्य करता है। एक ऐसा छोटा कार्य चुनिए जो परमेश्वर के वचन की अधीनता है, भले ही फल अभी न दिखे — क्षमा करना, सेवा करना, सच बोलना, उदारता दिखाना।
- “मेरे अविश्वास का उपाय कर” की प्रार्थना सीखिए। मरकुस 9:24 की यह प्रार्थना ईमानदार है। जब विश्वास डगमगाता है, तब यही पुकार उठाइए। परमेश्वर इसे सुनते हैं।
- विश्वास की डायरी रखिए। जब परमेश्वर प्रार्थना का उत्तर दें या किसी असम्भव स्थिति में सहायता करें, तो लिखिए। पीछे मुड़कर देखना भविष्य के लिए विश्वास का ईंधन है।
संबंधित पद
- इफिसियों 2:8-9 — “क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है… यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन् परमेश्वर का दान है।”
- याकूब 2:17 — “वैसा ही विश्वास भी, यदि कर्म सहित न हो तो अपने स्वभाव में मरा हुआ है।”
- मत्ती 17:20 — “यदि तुम्हारा विश्वास राई के दाने के बराबर भी हो… कोई बात तुम्हारे लिये अनहोनी न होगी।”
- 2 कुरिन्थियों 5:7 — “हम विश्वास से चलते हैं, देखने से नहीं।”
- मरकुस 9:24 — “हे प्रभु, मैं विश्वास करता हूँ; मेरे अविश्वास का उपाय कर!”
विचारणीय
विश्वास तौलने की वस्तु नहीं — चलने की राह है। आज जिस अनिश्चित परिस्थिति में आप खड़े हैं, परमेश्वर पर एक छोटा भरोसा रखकर एक छोटा कदम उठाइए। विश्वास उन्हीं कदमों से बढ़ता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
विश्वास का बाइबलीय अर्थ क्या है?
इब्रानियों 11:1 के अनुसार विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है। यह जीवन का वह दृष्टिकोण है जो परमेश्वर के वचन पर भरोसा करता है।
विश्वास कैसे बढ़ता है?
रोमियों 10:17 कहता है कि विश्वास सुनने से, और सुनना मसीह के वचन से होता है। पवित्र शास्त्र पढ़ना, सुनना, उस पर मनन करना — यही विश्वास का मार्ग है।
क्या छोटा विश्वास भी काम करता है?
हाँ। मत्ती 17:20 में यीशु कहता है कि यदि विश्वास राई के दाने के समान हो, तो भी पहाड़ हट सकता है। विश्वास की मात्रा से अधिक उसकी दिशा महत्व रखती है।
विश्वास और कर्म में क्या सम्बन्ध है?
याकूब 2:17 कहता है कि कर्म रहित विश्वास मरा हुआ है। उद्धार विश्वास के द्वारा अनुग्रह से होता है, परन्तु सच्चा विश्वास अच्छे कार्यों में दिखाई देता है।
जब विश्वास कमज़ोर हो तो क्या करें?
मरकुस 9:24 की प्रार्थना कीजिए: “हे प्रभु, मैं विश्वास करता हूँ; मेरे अविश्वास का उपाय कर!” शास्त्र पढ़ते रहें, प्रार्थना में बने रहें, और विश्वासी संगति में जुड़े रहें।