परमेश्वर का आदर कैसे करें
परिचय
उत्तरी चिली के सैन जोज़ की खान जब ढह गई थी, उसमें जोज़ हैंरिक्स गोंसालेज़ जो कि 69 दिनों से 2,300 फीट की गहराई में फंसे हुए थे, निकल आए। इसे एक अरब लोगों ने देखा। यह सब 13 अक्टूबर 2010 को रात 10 बजे हुआ था।
ऐसा अनुमान लगाया गया था कि उस रात या तो कोई भी बचा नहीं था, या फिर जो 33 जन फंस गये थे वे बहुत जल्द भूख के कारण मर जाएंगे।
इन 33 लोगों में बहुत से नास्तिक, अज्ञेयवादी, अविश्वासी, आधे-विश्वासी थे। जोस हैंरिक्स गोंज़ालेज़ को ‘सुसमाचार प्रचारक’ बुलाया जाता था, क्योंकि उसने यीशु पर विश्वास करने के लिये बहुतों की अगुवाई की थी। उसने एक प्रार्थना समूह बनाया और उसकी अगुवाई की। वह दिन में दो सभाओं की अगुवाई करता था 33 छोटी बाईबल के साथ जो उसके मित्रों ने भेजी थीं।
उन्होंने यह गवाही दी थी कि वे 34वें सदस्य बने हैं। 19 साल के खनिक, जिम्मी सैंकैज़ ने कहा कि, ‘हम सब मिलकर चौंतीस जन थे, क्योंकि परमेश्वर ने हमें कभी भी कम नहीं समझा।’ यीशु उनके साथ वहाँ पर थे। जब वे खान से बाहर निकले तब बाहर निकलने वाले सभी लोगों ने एक ही तरह के टी-शर्ट्स पहन रखे थे। उन टी-शर्ट्स के आगे लिखा हुआ था ‘प्रभु आपको धन्यवाद’ और पीछे लिखा हुआ था, ‘सारी महिमा और आदर उन्हीं को मिले’।
मुझे एच.टी.बी.। में जोज़ हेनरीकेज़ से मुलाकात करने का अवसर मिला। उन्होंने कहा कि ‘असली हीरो यीशु मसीह हैं’। सिर्फ वहीं एक हीरो हैं जिनकी चर्चा की जानी चाहिए। जो कार्य मनुष्यों ने खान के अन्दर और बाहर किए होंगे, उनके अलावा, सारी महिमा और सारा आदर सिर्फ यीशु को ही मिलना चाहिए.
यीशु ने हमें सिखाया कि हम प्रार्थना कैसे करें जिससे परमेश्वर के नाम का आदर हो (मत्ती 6:9)। मुझे सबसे ज्यादा डर सिर्फ इसी बात का लगता है कि मैं कहीं गलती से कुछ ऐसा कह या कर ना दूँ जिससे उनके नाम का अनादर हो। मेरी दिल की यही इच्छा है कि मैं इस समाज में एक बार फिर से प्रभु के नाम को आदर मिलता हुआ देखूँ।
उनके नाम को आदर पहुँचता हुआ देखने के लिए आपको क्या करना चाहिए?
नीतिवचन 30:24-33
24 चार जीव धरती के,
जो यद्यपि बहुत क्षुद्र हैं किन्तु उनमें अत्याधिक विवेक भरा हुआ है।
25 चीटियाँ जिनमें शक्ति नहीं होती है
फिर भी वे गर्मी में अपना खाना बटोरती हैं;
26 बिज्जू दुर्बल प्राणी हैं फिर भी
वे खड़ी चट्टानों में घर बनाते;
27 टिड्डियों का कोई भी राजा नहीं होता है
फिर भी वे पंक्ति बाँध कर एक साथ आगे बढ़ती हैं।
28 और वह छिपकली जो बस केवल हाथ से ही
पकड़ी जा सकती है, फिर भी वह राजा के महलों में पायी जाती।
29 तीन प्राणी ऐसे हैं जो लगते महत्वपूर्ण
जब वे चलते हैं, दरअसल वे चार हैं:
30 एक सिंह, जो सभी पशुओं में शक्तिशाली होता है,
जो कभी किसी से नहीं डरता;
31 गर्वीली चाल से चलता हुआ मुर्गा और एक बकरा और वह राजा जो अपनी सेना के मध्य है।
32 तूने यदि कभी कोई मूर्खता का आचरण किया हो,
और अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बना हो अथवा तूने कभी कुचक्र रचा हो तो तू अपना मुँह अपने हाथों से ढक ले।
33 जैसे मथने से दूध मक्खन निकालता है और नाक मरोड़ने से
लहू निकल आता है वैसे ही क्रोध जगाना झगड़ों का भड़काना होता है।
समीक्षा
बुराई नहीं, बल्कि भलाई फैलाइये
हमारा सारा जीवन खुद के लिए नहीं बल्कि यीशु के नाम को ऊँचा उठाने के लिए समर्पित होना चाहिए। नीतिवचन के लेखक ने कहा, ‘यदि तू ने अपनी बड़ाई करने की मूढ़ता की, या कोई बुरी युक्ति बान्धी हो, तो अपने मुंह पर हाथ रख। क्योंकि जैसे दूध के मथने से मक्खन और नाक के मरोड़ने से लोहू निकलता है, वैसे ही क्रोध के भड़काने से झगड़ा उत्पन्न होता है’ (व. 32-33) समाज में अगर कोई झगड़े, विरोध और क्रोध को फैलाता है तो उसे भड़काने वाला कहा जाता है।
इसके विपरीत है, अच्छी बातें फैलाना। आप ऐसा बनने की कोशिश कीजिए जो कभी क्रोध नहीं, बल्कि हमेशा अच्छाई को फैलाए। कभी भी खुद को नहीं, बल्कि यीशु को ऊँचा उठाइए। हमेशा प्रभु के नाम को महिमा दीजिए।
प्रार्थना
प्रकाशित वाक्य 9:13-10:11
छठवीं तुरही का बजना
13 फिर छठे स्वर्गदूत ने जैसे ही अपनी तुरही फूँकी, वैसे ही मैंने परमेश्वर के सामने एक सुनहरी वेदी देखी, उसके चार सींगों से आती हुई एक ध्वनि सुनी। 14 तुरही लिए हुए उस छठे स्वर्गदूत से उस आवाज़ ने कहा, “उन चार स्वर्गदूतों को मुक्त कर दो जो फरात महानदी के पास बँधे पड़े हैं।”
15 सो चारों स्वर्गदूत मुक्त कर दिए गए। वे उसी घड़ी, उसी दिन, उसी महीने और उसी वर्ष के लिए तैयार रखे गए थे ताकि वे एक तिहाई मानव जाति को मार डालें। 16 उनकी पूरी संख्या कितनी थी, यह मैंने सुना। घुड़सवार सैनिकों की संख्या बीस करोड़ थी।
17 उस मेरे दिव्य दर्शन में वे घोड़े और उनके सवार मुझे इस प्रकार दिखाई दिए: उन्होंने कवच धारण किए हुए थे जो धधकती आग जैसे लाल, गहरे नीले और गंधक जैसे पीले थे। 18 इन तीन महाविनाशों से यानी उनके मुखों से निकल रही अग्नि, धुआँ और गंधक से एक तिहाई मानव जाति को मार डाला गया। 19 इन घोड़ों की शक्ति उनके मुख और उनकी पूँछों में निहित थी क्योंकि उनकी पूँछें सिरदार साँपों के समान थी जिनका प्रयोग वे मनुष्यों को हानि पहुँचाने के लिए करते थे।
20 इस पर भी बाकी के ऐसे लोगों ने जो इन महा विनाशों से भी नहीं मारे जा सके थे उन्होंने अपने हाथों से किए कामों के लिए अब भी मन न फिराया तथा भूत-प्रेतों की अथवा सोने, चाँदी, काँसे, पत्थर और लकड़ी की उन मूर्तियों की उपासना नहीं छोड़ी, जो न देख सकती हैं, न सुन सकती हैं और न ही चल सकती हैं। 21 उन्होंने अपने द्वारा की गई हत्याओं, जादू टोनों, व्यभिचारों अथवा चोरी-चकारी करने से मन न फिराया।
स्वर्गदूत और छोटी पोथी
10फिर मैंने आकाश से नीचे उतरते हुए एक और बलवान स्वर्गदूत को देखा। उसने बादल को ओढ़ा हुआ था तथा उसके सिर के आस-पास एक मेघ धनुष था। उसका मुखमण्डल सूर्य के समान तथा उसकी टाँगे अग्नि स्तम्भों के जैसी थीं। 2 अपने हाथ में उसने एक छोटी सी खुली पोथी ली हुई थी। उसने अपना दाहिना चरण सागर में और बाँया चरण धरती पर रखा। 3 फिर वह सिंह के समान दहाड़ता हुआ ऊँचे स्वर में चिल्लाया। उसके चिल्लाने पर सातों गर्जन-तर्जन के शब्द सुनाई देने लगे।
4 जब सातों गर्जन हो चुके और मैं लिखने को ही था, तभी मैंने एक आकाशवाणी सुनी, “सातों गर्जनों ने जो कुछ कहा है, उसे छिपा ले तथा उसे लिख मत।”
5 फिर उस स्वर्गदूत ने जिसे मैंने समुद्र में और धरती पर खड़े देखा था, आकाश में ऊपर दाहिना हाथ उठाया। 6 और जो नित्य रूप से सजीव है, जिसने आकाश को तथा आकाश की सब वस्तुओं को, धरती एवं धरती पर की तथा सागर और जो कुछ उसमें है, उन सब की रचना की है, उसकी शपथ लेकर कहा, “अब और अधिक देर नहीं होगी। 7 किन्तु जब सातवें स्वर्गदूत को सुनने का समय आएगा अर्थात् जब वह अपनी तुरही बजाने को होगा तभी परमेश्वर की वह गुप्त योजना पूरी हो जाएगी जिसे उसने अपने सेवक नबियों को बता दिया था।”
8 उस आकाशवाणी ने, जिसे मैंने सुना था, मुझसे फिर कहा, “जा और उस स्वर्गदूत से जो सागर में और धरती पर खड़ा है, उसके हाथ से उस खुली पोथी को ले ले।”
9 सो मैं उस स्वर्गदूत के पास गया और मैंने उससे कहा कि वह उस छोटी पोथी को मुझे दे दे। उसने मुझसे कहा, “यह ले और इसे खा जा। इससे तेरा पेट कड़वा हो जाएगा किन्तु तेरे मुँह में यह शहद से भी ज्यादा मीठी बन जाएगी।” 10 फिर उस स्वर्गदूत के हाथ से मैंने वह छोटी सी पोथी ले ली और मैंने उसे खा लिया। मेरे मुख में यह शहद सी मीठी लगी किन्तु मैं जब उसे खा चुका तो मेरा पेट कड़वा हो गया। 11 इस पर वह मुझसे बोला, “तुझे बहुत से लोगों, राष्ट्रों, भाषाओं और राजाओं के विषय में फिर भविष्यवाणी करनी होगी।”
समीक्षा
यीशु के सुसमाचार का प्रचार कीजिए
जब आप यीशु के बारे में संसार को बताते हैं तब आप उनके नाम का आदर करते हैं। सभी रुचि नहीं दिखाएंगे, लेकिन कुछ दिखाएंगे। जो विश्वास करते हैं उनके लिए सुसमाचार ‘शहद जैसा मीठ’ रहेगा (10:9), और यीशु उनका जीवन परिवर्तित कर देंगे।
न्याय की भयानक चेतावनी छठे स्वर्गदूत की तुरही बजने के साथ जारी रही। वहाँ भयानक युद्ध हुआ, (‘वे करीब दो सौ लाख घुड़सवार सैनिक थे’, 9:16) हिंसात्मक मृत्यु और ज़ख्म थे।
बीसवीं सदी शायद इतिहास की सबसे हिंसात्मक सदी थी और शायद पहली जिसमें ऐसा युद्ध हुआ होगा। फिर भी, बहुत कम पश्चाताप हुआ है।
‘जो महिलाएं और पुरुष उन हथियारों के द्वारा नहीं मारे गए थे वे अपने मार्ग पर फिर से खुशी-खुशी चलने लगे – बिना अपने जीवन को बदले... उनके हृदय में बदलाव का कोई चिन्ह नहीं था। वे अपने घातक, मनोगत, अविवेकित और चोरी की राह पर चलते चले गए’ (वव. 20:21, एम.एस.जी)। आपको यह जानने के लिए सिर्फ न्यूज़ देखने की जरूरत है, कि यह बातें आपके समय में भी पूरी हो रही हैं।
फिर यूहन्ना ने स्वर्ग से ‘एक और महान स्वर्गदूत को आते हुए देखा’ (10:1)। उनकी आवाज यीशु की तरह ही थी। वो एक बादल से घिरे हुए थे, जो परमेश्वर की उपस्थिती को दर्शाते हैं। उनके सिर के ऊपर एक इन्द्रधनुष है जो परमेश्वर के वायदे को दर्शाते हैं। ‘उनका चेहरा सूरज की तरह था, और उनके पांव तेजस्वी स्तंभ की तरह थे’ (व. 1)।
यह प्रकाशितवाक्य 1:12-16 में बताए गए यीशु के वर्णन के समान है। ‘और वह ऐसे बड़े शब्द से चिल्लाया, जैसे सिंह गरजता है’ (10:3) – यीशु यहूदा गोत्र का सिंह है (5:5)। (नीतिवचन से आज हमने जो वचन पढ़े, उनमें सिंह को ‘पशुओं का राजा कहा गया है, जो किसी से नहीं डरता है’, नीतिवचन 30:30, एम.एस.जी)।
यीशु ने यूहन्ना को एक पुस्तक दी और कहा इसे लेकर खा लो: ‘यह तेरा पेट कड़वा तो करेगी, पर तेरे मुंह में मधु सी मीठी लगेगी’ (प्रकाशितवाक्य 10:9)। जो सुसमाचार को नकारेंगे उनके लिए उसका स्वाद कड़वा तो रहेगा, लेकिन जो उसे स्वीकारेंगे, उनके लिए वह ‘शहद की तरह मीठा’ रहेगा (व. 9)।
फिर, यूहन्ना को यह वचन निकालने के लिए कहा गया: ‘तुझे बहुत से लोगों, और जातियों, और भाषाओं, और राजाओं पर, फिर भविष्यवाणी करनी होगी’ (व. 11)।
प्रार्थना
एज्रा 2:68-4:5
68 वह समूह यरूशलेम में यहोवा के मन्दिर को पहुँचा। तब परिवार के प्रमुखों ने यहोवा के मन्दिर को बनाने के लिये अपनी भेंटें दीं। उन्होंने जो मन्दिर नष्ट हो गया था उसी के स्थान पर नया मन्दिर बनाना चाहा। 69 उन लोगों ने उतना दिया जितना वे दे सकते थे। ये वे चीज़ें हैं जिन्हें उन्होंने मन्दिर बनाने के लिये दिया: लगभग पाँच सौ किलो सोना, तीन टन चाँदी और याजकों के पहनने वाले सौ चोगे।
70 इस प्रकार याजक, लेवीवंशी और कुछ अन्य लोग यरूशलेम और उसके चारों ओर के क्षेत्र में बस गये। इस समूह में मन्दिर के गायक, द्वारपाल और मन्दिर के सेवक सम्मिलित थे। इस्राएल के अन्य लोग अपने निजी निवास स्थानों में बस गये।
वेदी का फिर से बनना
3अत, सातवें महीने से इस्राएल के लोग अपने अपने नगरों में लौट गये। उस समय, सभी लोग यरूशलेम में एक साथ इकट्ठे हुए। वे सभी एक इकाई के रूप में संगठित थे। 2 तब योसादाक के पुत्र येशू और उसके साथ याजकों तथा शालतीएल के पुत्र जरूब्बाबेल और उसके साथ के लोगों ने इस्राएल के परमेश्वर की वेदी बनाई। उन लोगों ने इस्राएल के परमेश्वर के लिये वेदी इसलिए बनाई ताकि वे इस पर बलि चढ़ा सकें। उन्होंने उसे ठीक मूसा के नियमों के अनुसार बनाया। मूसा परमेश्वर का विशेष सेवक था।
3 वे लोग अपने आस—पास के रहने वाले अन्य लोगों से डरे हुए थे। किन्तु यह भय उन्हें रोक न सका और उन्होंने वेदी की पुरानी नींव पर ही वेदी बनाई और उस पर यहोवा को होमबलि दी। उन्होंने वे बलियाँ सवेरे और शाम को दीं। 4 तब उन्होंने आश्रयों का पर्व ठीक वैसे ही मनाया जैसा मूसा के नियम में कहा गया है। उन्होंने उत्सव के प्रत्येक दिन के लिये उचित संख्या में होमबलि दी। 5 उसके बाद, उन्होंने लगातार चलने वाली प्रत्येक दिन की होमबलि नया चाँद और सभी अन्य उत्सव व विश्राम के दिनों की भेंटें चढ़ानी आरम्भ कीं जैसा कि यहोवा द्वारा आदेश दिया गया था। लोग अन्य उन भेंटों को भी चढ़ाने लगे जिन्हें वे यहोवा को चढ़ाना चाहते थे। 6 अत: सातवें महीने के पहले दिन इस्राएल के इन लोगों ने यहोवा को फिर भेंट चढ़ाना आरम्भ किया। यह तब भी किया गया जबकि मन्दिर की नींव अभी फिर से नहीं बनी थी।
मन्दिर का पुन: निर्माण
7 तब उन लोगों ने जो बन्धुवाई से छूट कर आये थे, संगतराशों और बढ़ईयों को धन दिया और उन लोगों ने उन्हें भोजन, दाखमधु और जैतून का तेल दिया। उन्होंने इन चीजों का उपयोग सोर और सीदोन के लोगों को लबानोन से देवदार के लट्ठों को लाने के लिये भुगतान करने में किया। वे लोग चाहते थे कि जापा नगर के समुद्री तट पर लट्ठों को जहाजों द्वारा ले आएँ। जैसा कि सुलैमान ने किया था जब उसने पहले मन्दिर को बनाया था। फारस के राजा कुस्रू ने यह करने के लिये उन्हें स्वीकृति दे दी।
8 अत: यरूशलेम में मन्दिर पर उनके पहुँचने के दूसरे वर्ष के दूसरे महीने मे शालतीएल के पुत्र जरुब्बाबेल और योसादाक के पुत्र येशू ने काम करना आरम्भ किया। उनके भाईयों, याजकों, लेवीवंशियों और प्रत्येक व्यक्ति जो बन्धुवाई से यरूशलेम लौटे थे, सब ने उनके साथ काम करना आरम्भ किया। उन्होंने यहोवा के मन्दिर को बनाने के लिये उन लेवीवंशियों को प्रमुख चुना जो बीस वर्ष या उससे अधिक उम्र के थे। 9 ये वे लोग थे जो मन्दिर के बनने की देखरेख कर रहे थे, येशू के पुत्र और उसके भाई, कदमीएल और उसके पुत्र (यहूदा के वंशज थे) हेनादाद के पुत्र और उनके बन्धु लेवीवंशी। 10 कारीगरों ने यहोवा के मन्दिर की नींव डालनी पूरी कर दी। जब नींव पड़ गई तब याजकों ने अपने विशेष वस्त्र पहने। तब उन्होंने अपनी तुरही ली और आसाप के पुत्रों ने अपने झाँझों को लिया। उन्होंने यहोवा की स्तुति के लिये अपने अपने स्थान ले लिये। यह उसी तरह किया गया जिस तरह करने के लिये भूतकाल में इस्राएल के राजा दाऊद ने आदेश दिया था। 11 यहोवा ने जो कुछ किया, उन्होंने उसके लिये उसकी प्रशंसा करते हुए तथा धन्यवाद देते हुए, यह गीत गाया,
“वह अच्छा है,
उसका इस्राएल के लिए प्रेम शाश्वत है।”
और तब सभी लोग खुश हुए। उन्होंने बहुत जोर से उद्घोष और यहोवा की स्तुति की। क्यों? क्योंकि मन्दिर की नींव पूरी हो चुकी थी।
12 किन्तु बुजुर्ग याजकों में से बहुत से, लेवीवंशी और परिवार प्रमुख रो पड़े। क्यों? क्योंकि उन लोगों ने प्रथम मन्दिर को देखा था, और वे यह याद कर रहे थे कि वह कितना सुन्दर था। वे रो पड़े जब उन्होंने नये मन्दिर को देखा। वे रो रहे थे जब बहुत से अन्य लोग प्रसन्न थे और शोर मचा रहे थे। 13 उद्घोष बहुत दूर तक सुना जा सकता था। उन सभी लोगों ने इतना शोर मचाया कि कोई व्यक्ति प्रसन्नता के उद्घोष और रोने में अन्तर नहीं कर सकता था।
मन्दिर के पुनः निर्माण के विरुद्ध शत्रु
4उस क्षेत्र में रहने वाले वहुत से लोग यहूदा और बिन्यामीन के लोगों के विरूद्ध थे। उन शत्रुओं ने सुना कि वे लोग जो बन्धुवाई से आये हैं वे, इस्राएल के परमेश्वर यहोवा के लिये एक मन्दिर बना रहे हैं। इसलिये वे शत्रु जरुब्बाबेल तथा परिवार प्रमुखों के पास आए और उन्होंने कहा, “मन्दिर बनाने में हमें तुमको सहायता करने दो। हम लोग वही हैं जो तुम हो, हम तुम्हारे परमेश्वर से सहायता माँगते हैं। हम लोगों ने तुम्हारे परमेश्वर को तब से बलि चढ़ाई है जब से अश्शूर का राजा एसर्हद्दोन हम लोगों को यहाँ लाया।”
3 किन्तु जरुब्बाबेल, येशू और इस्राएल के अन्य परिवार प्रमुखों ने उत्तर दिया, “नहीं, तुम जैसे लोग हमारे परमेश्वर के लिये मन्दिर बनाने में हमें सहायता नहीं कर सकते। केवल हम लोग ही यहोवा के लिये मन्दिर बना सकते हैं। वह इस्राएल का परमेश्वर है। फारस के राजा कुस्रू ने जो करने का आदेश दिया है, वह यही है।”
4 इससे वे लोग क्रोधित हो उठे। अत: उन लोगों ने यहूदियों को परेशान करना आरम्भ किया। उन्होंने उनको हतोत्साह और मन्दिर को बनाने से रोकने का प्रयत्न किया। 5 उन शत्रुओं ने सरकारी अधिकारियों को यहूदा के लोगों के विरुद्ध काम करने के लिए खरीद लिया। उन अधिकारियों ने यहूदियों द्वारा मन्दिर को बनाने की योजना को रोकने के लिए लगातार काम किया। यह उस दौरान तब तक लगातार चलता रहा जब तक कुस्रू फारस का राजा रहा और बाद में जब तक दारा फारस का राजा नहीं हो गया।
समीक्षा
प्रभु के आदर के लिए बलिदान दीजिए
हमें एक समस्या-मुक्त जीवन की आशा नहीं करनी चाहिए। यीशु ने हमें चिताया था कि हमें इस जीवन में परेशानियों का सामना करना पड़ेगा (यूहन्ना 16:33)। विश्वास आपको समस्या से दूर नहीं रखता, परंतु यह उसमें से गुज़रने में आपकी सहायता करता है। आप समस्या पर नहीं, बल्कि उन पर ध्यान दीजिए जो उसमें से गुज़रने में आपकी सहायता करते हैं, और उनके नाम को आदर पहुँचाने के लिए आप बलिदान देने के लिए इच्छुक रहिए।
परमेश्वर के लोग यरुशलेम में मंदिर का पुन:निर्माण करने के लिए उत्सुक थे। जब बेबीलोन के लोगों ने मंदिर को नाश किया था तब परमेश्वर के नाम का अनादर हुआ था। अब इनके पास वह अवसर था कि वे उसे पुन:निर्माण करके परमेश्वर के नाम को फिर से आदर दे सकें।
उन्होंने बीस वर्ष अथवा उस से अधिक अवस्था के लेवियों को यहोवा के भवन का काम चलाने के लिये नियुक्त किया (एज़्रा 3:8)। यह युवा अगुओं को नियुक्त करने का अच्छा उदाहरण है। वे अपने धन और संपत्ति को त्यागने के लिए तैयार थे। उन्होंने अपनी अपनी पूंजी के अनुसार इकसठ हजार दर्कमोन सोना और पांच हजार माने चान्दी और याजकों के योग्य एक सौ अंगरखे अपनी अपनी इच्छा से उस काम के खजाने में दे दिए (एज़्रा 2:68-69)।
देना परमेश्वर के प्रति आपकी आराधना और सेवकाई का एक महत्वपूर्ण भाग है। आपकी भेंट कुड़कुड़ाते हुए या मजबूरी में दी गई नहीं, बल्कि धन्यवाद से दी हुई होनी चाहिए ‘इच्छा से दी गई भेंट’। अपनी भेंट की तुलना दूसरों की भेंट के साथ मत कीजिए, बल्कि वही दीजिए जो आप दे सकते हैं। इस भेंट की सुंदर बात यह थी कि सब ने अपनी अपनी क्षमता के अनुसार दिया था, इसलिए वे सारी रकम जमा कर पाए थे जिसकी उन्हें आवश्यक्ता थी।
अगर कलीसिया में हर कोई अपनी क्षमता के अनुसार बलिदानपूर्वक, धन्यवाद के साथ देने लगेगा, तो परमेश्वर का राज्य जल्दी से बढ़ेगा और उनके नाम का आदर होगा।
आस-पास के विरोध के बावजूद (‘आसपास के लोगों से डरे बिना’, 3.3अ), वे फिर से परमेश्वर को बलिदान देते हुए उनकी आराधना करने लगे। आज, अपने शरीर को परमेश्वर के लिए एक जीवित बलिदान के रूप में समर्पित कीजिए (रोमियों 12:2) – यानि, आपके पास जो भी है, आप जो भी हैं, उसे उनके नाम के आदर के लिए समर्पित कीजिए।
उन्होंने आराधना करने के लिए मंदिर के फिर से बनने तक का इंतज़ार नहीं किया। जैसे ही नींव का निर्माण हुआ, ‘वे यह गा गाकर परमेश्वर की स्तुति और धन्यवाद करने लगे, कि वह भला है, और उसकी करुणा इस्राएल पर सदैव बनी है। और जब वे यहोवा की स्तुति करने लगे तब सब लोगों ने यह जान कर कि यहोवा के भवन की नींव अब पड़ रही है, ऊंचे शब्द से जयजयकार किया’ (एज़्रा 3:11)।
अत्यधिक आराधना सिर्फ एक समकालीन घटना नहीं है! ‘लोग ऊंचे शब्द से जयजयकार कर रहे थे, और वह शब्द दूर दूर तक सुनाई देता था’ (वव. 12ब-13)। और फिर भी, जब कई लोग जयजयकार कर रहे थे, तब कुछ वृद्ध सदस्य इस मंदिर की नींव को देखकर रोने लगे ‘जब इस भवन की नींव उनकी आंखों के सामने पड़ी तब वे फूट फूटकर रोने लगे’ (व. 12अ)।
यह शायद इसलिए हुआ होगा क्योंकि जिन पत्थरों का उपयोग हो रहा था वे पहले से छोटे थे और अलग नहीं थे। यह एक अनुस्मारक है कि यह मंदिर समाधान नहीं है बल्कि यह परमेश्वर के लोगों द्वारा - सिर्फ पवित्र आत्मा के मंदिर का पूर्वाभास है, जिसमें यीशु मुख्य आधार हैं (इफीसियों 2:19-22)।
इस मंदिर के निर्माण का भी विरोध किया गया था: ‘तब उस देश के लोग यहूदियों के हाथ ढीला करने और उन्हें डरा कर मन्दिर बनाने में रुकावट डालने लगे। और फारस के राजा कुस्रू के जीवन भर वरन फारस के राजा के शासनकाल तक उनके मनोरथ को निष्फल करने के लिये वकीलों को रुपया देते रहे’ (एज़्रा 4:4-5)।
जब आप प्रभु का आदर करने की कोशिश करेंगे, तो आपका विरोध हो सकता है। चाहें आप आज कलीसिया का पुन:निर्माण करना चाहें, या परमेश्वर के राज्य के लिए कोई और कार्य करना चाहें, विरोध का होना निश्चित है। विरोध के कारण उन्हें देरी जरूर हुई, लेकिन विरोध उन्हें हरा नहीं पाया।
प्रार्थना
पिप्पा भी कहते है
प्रकाशितवाक्य 10:1-3
' फिर मैं ने एक और बली स्वर्गदूत को बादल ओढ़े हुए स्वर्ग से उतरते हुए देखा, उसके सिर पर मेघधनुष था: और उसका मुंह सूर्य का सा और उसके पांव आग के खंभे के से थे... उस ने अपना दाहिना पांव समुद्र पर, और बायां पृथ्वी पर रखा। और ऐसे बड़े शब्द से चिल्लाया, जैसे सिंह गरजता है ...’
हमें शायद ऐसा लगता होगा कि दुनिया बेकाबू है, लेकिन परमेश्वर, सर्वशक्तिमान परमेश्वर हैं।
दिन का वचन
प्रकाशितवाक्य 10:1
फिर मैं ने एक और बली स्वर्गदूत को बादल ओढ़े हुए स्वर्ग से उतरते देखा, उसके सिर पर मेघधनुष था: और उसका मुंह सूर्य का सा और उसके पांव आग के खंभे के से थे।

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संदर्भ
जहाँ पर कुछ बताया न गया हो, उन वचनों को पवित्र बाइबल, न्यू इंटरनैशनल संस्करण एन्ग्लिसाइड से लिया गया है, कॉपीराइट © 1979, 1984, 2011 बिबलिका, पहले इंटरनैशनल बाइबल सोसाइटी, हूडर और स्टोगन पब्लिशर की अनुमति से प्रयोग किया गया, एक हॅचेट यूके कंपनी सभी अधिकार सुरक्षित। ‘एनआईवी’, बिबलिका यू के का पंजीकृत ट्रेडमार्क संख्या 1448790 है।
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