स्वस्थ कैसे बने रहें
परिचय
- धूम्रपान और तंबाकू से बने उत्पादों का सेवन न करें
- हर दिन शारीरिक रूप से सक्रिय रहें
- स्वास्थयवर्धक भोजन करें
- अपना उचित वज़न बनाए रखें
- अपने रक्त - चाप को सही बनाए रखें
- अपने कोलेस्ट्रोल पर संपूर्ण नियंत्रण रखें
- अपने रक्त में उचित शर्करा बनाए रखें
अमेरीकन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार, आपके हृदय को स्वस्थ बनाए रखने के लिए इन सात बातों को करना ज़रूरी है।
एक मनुष्य के हृदय का वज़न एक पाउंड (450 ग्राम) से कम होता है। यह एक दिन में 1,00,000 बार धड़कता है और संपूर्ण जीवनकाल में औसतन 2.5 बिलियन बार धड़कता है। आपकी रक्त वाहनियाँ – धमनियाँ, शिराएं और रक्त कोशिकाएं – 60,000 मील से भी ज़्यादा लंबी हैं – पूरी दुनिया का दो चक्कर लगाने से भी ज़्यादा।
यह एक आश्चर्यजनक कौतुक नहीं है; यह मानवीय जीवन का हृदय है। आपके हृदय के बिना आपका शरीर शीघ्र ही काम करना बंद कर देगा। पश्चिमी दुनिया में हृदय रोग मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है।
यीशु ने हृदय के बारे में ज़ोर देकर कहा है। हृदय आंतरिक जीवन की उपमा है। यीशु के इस शब्द का अर्थ शारीरिक, आत्मिक और मानसिक आधार है। हृदय, संपूर्ण आंतरिक जीवन – सोचने, महसूस करने और इच्छा करने का स्रोत है।
परमेश्वर मुख्य रूप से आपके हृदय की चिंता करते हैं। वह चाहते हैं कि आपका हृदय स्वस्थ रहे। उन्होंने शमूएल से कहा, 'न तो उसके रूप पर दृष्टि कर, और न उसके डील की ऊंचाई पर, क्योंकि मैं ने उसे अयोग्य जाना है; क्योंकि परमेश्वर का देखना मनुष्य का सा नहीं है; मनुष्य तो बाहर का रूप देखता है, परन्तु परमेश्वर की दृष्टि मन पर रहती है' (1 शमूएल 16:7)।
बल्कि शारीरिक हृदय के स्वस्थ रहने से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण आपके आत्मिक हृदय की स्थिति है। आज के इस लेखांश में हम देखेंगे कि अपने आत्मिक हृदय को कैसे स्वस्थ रखा जाए।
नीतिवचन 6:20-29
दुराचार के विरुद्ध चेतावनी
20 हे मेरे पुत्र, अपने पिता की आज्ञा का पालन कर और
अपनी माता की सीख को कभी मत त्याग।
21 अपने हृदय पर उनको सदैव बाँध रह और
उन्हें अपने गले का हार बना ले।
22 जब तू आगे बढ़ेगा, वे राह दिखायेंगे।
जब तू सो जायेगा, वे तेरी रखवाली करेंगे और जब तू जागेगा,
वे तुझसे बातें करेंगे।
23 क्योंकि ये आज्ञाएँ दीपक हैं और
यह शिक्षा एक ज्योति है।
अनुशासन के सुधार तो जीवन का मार्ग है।
24 जो तुझे चरित्रहीन स्त्री से और
भटकी हुई कुलटा की फुसलाती बातों से बचाते हैं।
25 तू अपने मन को उसकी सुन्दरता पर कभी वासना सक्त मत होने दे और
उसकी आँखों का जादू मत चढ़ने दे।
26 क्योंकि वह वेश्या तो तुझको रोटी—
रोटी का मुहताज कर देगी किन्तु वह कुलटा तो तेरा जीवन ही हर लेगी!
27 क्या यह सम्भव है कि कोई किसी के गोद में आग रख दे और
उसके वस्त्र फिर भी जरा भी न जलें?
28 दहकते अंगारों पर क्या कोई जन
अपने पैरों को बिना झुलसाये हुए चल सकता है?
29 वह मनुष्य ऐसा ही है जो किसा अन्य की पत्नी से समागम करता है।
ऐसी पर स्त्री के जो भी कोई छूएगा, वह बिना दण्ड पाये नहीं रह पायेगा।
समीक्षा
1. अपने मन की रक्षा करें
यीशु ने सिखाया कि व्यभिचार मन से शुरू होता है। उन्होंने ऐसा कहा था, ' मैं तुम से यह कहता हूँ, कि जो कोई किसी स्त्री पर कुदृष्टि डाले वह अपने मन में उस से व्यभिचार कर चुका' (मत्ती 5:28)। उनकी शिक्षा नीतिवचन पर जाती है जहाँ लेखक मन के महत्त्व पर ज़ोर देता है – 'उसकी सुन्दरता देख कर अपने मन में उसकी अभिलाषा न कर' (नीतिवचन 6:25)।
वह व्यभिचार के भयंकर खतरे के बारे में चेतावनी देता है। हम आग के समान बहुत ही शक्तिशाली चीज़ से निपट रहे हैं। अपनी सही जगह में (अग्निकुण्ड के जैसे) विवाह में लैंगिकता एक बड़ी आशीष है।
मगर, यदि आप अपनी लैंगिक अभिलाषा को गलत दिशा में जाने दें तो यह आपकी छाती पर रखी अग्नि के समान है: 'क्या हो सकता है कि कोई अपनी छाती पर आग रख ले; और उसके कपड़े न जलें? क्या हो सकता है कि कोई अंगारे पर चले, और उसके पांव न झुलसें? जो पराई स्त्री के पास जाता है, उसकी दशा ऐसी है; वरन जो कोई उस को छूएगा वह दण्ड से न बचेगा' (पद - 27-29)।
व्यभिचार कहीं और से नहीं आता। बेवफाई मन से शुरू होती है। यहीं पर आपको आत्म-अनुशासन में रहना है। बुद्धि के इन शब्दों को अपने हृदय में सदा गांठ बान्ध कर रख लो और अपने गले का हार बना लो। (पद - 21)।
प्रार्थना
मरकुस 12:28-44
सबसे बड़ा आदेश
28 फिर एक यहूदी धर्मशास्त्री आया और उसने उन्हें वाद-विवाद करते सुना। यह देख कर कि यीशु ने उन्हें किस अच्छे ढंग से उत्तर दिया है, उसने यीशु से पूछा, “सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण आदेश कौन सा है?”
29 यीशु ने उत्तर दिया, “सबसे महत्त्वपूर्ण आदेश यह है: ‘हे इस्राएल, सुन! केवल हमारा परमेश्वर ही एकमात्र प्रभु है। 30 समूचे मन से, समूचे जीवन से, समूची बुद्धि से और अपनी सारी शक्ति से तुझे प्रभु अपने परमेश्वर से प्रेम करना चाहिये।’ 31 दूसरा आदेश यह है: ‘अपने पड़ोसी से वैसे ही प्रेम कर जैसे तू अपने आप से करता है।’ इन आदेशों से बड़ा और कोई आदेश नहीं है।”
32 इस पर यहूदी धर्मशास्त्री ने उससे कहा, “गुरु, तूने ठीक कहा। तेरा यह कहना ठीक है कि परमेश्वर एक है, उसके अलावा और दूसरा कोई नहीं है। 33 अपने समूचे मन से, सारी समझ-बूझ से, सारी शक्ति से परमेश्वर को प्रेम करना और अपने समान अपने पड़ोसी से प्यार रखना, सारी बलियों और समर्पित भेटों से जिनका विधान किया गया है, अधिक महत्त्वपूर्ण है।”
34 जब यीशु ने देखा कि उस व्यक्ति ने समझदारी के साथ उत्तर दिया है तो वह उससे बोला, “तू परमेश्वर के राज्य से दूर नहीं है।” इसके बाद किसी और ने उससे कोई और प्रश्न पूछने का साहस नहीं किया।
क्या मसीह दाऊद का पुत्र या दाऊद का प्रभु है?
35 फिर यीशु ने मन्दिर में उपदेश देते हुए कहा, “धर्मशास्त्री कैसे कहते हैं कि मसीह दाऊद का पुत्र है? 36 दाऊद ने स्वयं पवित्र आत्मा से प्रेरित होकर कहा था:
‘प्रभु परमेश्वर ने मेरे प्रभु (मसीह) से कहा:
मेरी दाहिनी ओर बैठ
जब तक मैं तेरे शत्रुओं को तेरे पैरों तले न कर दूँ।’
37 दाऊद स्वयं उसे ‘प्रभु’ कहता है। फिर मसीह दाऊद का पुत्र कैसे हो सकता है?” एक बड़ी भीड़ प्रसन्नता के साथ उसे सुन रही थी।
धर्मशास्त्रियों के विरोध में यीशु की चेतावनी
38 अपने उपदेश में उसने कहा, “धर्मशास्त्रियों से सावधान रहो। वे अपने लम्बे चोगे पहने हुए इधर उधर घूमना पसंद करते हैं। बाजारों में अपने को नमस्कार करवाना उन्हें भाता है। 39 और आराधनालयों में वे महत्वपूर्ण आसनों पर बैठना चाहते हैं। वे जेवनारों में भी अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान पाने की इच्छा रखते हैं। 40 वे विधवाओं की सम्पति हड़प जाते हैं। दिखावे के लिये वे लम्बी-लम्बी प्रार्थनाएँ बोलते हैं। इन लोगों को कड़े से कड़ा दण्ड मिलेगा।”
सच्चा दान
41 यीशु दान-पात्र के सामने बैठा हुआ देख रहा था कि लोग दान पात्र में किस तरह धन डाल रहे हैं। बहुत से धनी लोगों ने बहुत सा धन डाला। 42 फिर वहाँ एक गरीब विधवा आयी और उसने उसमें दो दमड़ियाँ डालीं जो एक पैसे के बराबर भी नहीं थीं।
43 फिर उसने अपने चेलों को पास बुलाया और उनसे कहा, “मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, धनवानों द्वारा दान-पात्र में डाले गये प्रचुर दान से इस निर्धन विधवा का यह दान कहीं महान है। 44 क्योंकि उन्होंने जो कुछ उनके पास फालतु था, उसमें से दान दिया, किन्तु इसने अपनी दीनता में जो कुछ इसके पास था सब कुछ दे डाला। इसके पास इतना सा ही था जो इसके जीवन का सहारा था!”
समीक्षा
2. पूरे मन से यीशु से प्रेम करें
मरकुस 12:28-37
यीशु की शिक्षा के बारे में कुछ प्रसन्न कर देने वाली बातें हैं: 'और भीड़ में लोग उसको आनन्द से सुनते थे' (पद - 37ब)। यदि मुझे इन शिक्षाओं को एक शब्द में संक्षिप्त करने के लिए कहा जाए, तो मैं 'प्रेम' शब्द का उपयोग करना चाहूँगा।
जब यीशु से शास्त्रियों ने पूछा कि सबसे महत्त्वपूर्ण आज्ञा कौन सी है, तो उन्होंने उत्तर दिया, 'तू अपने प्रभु परमेश्वर से अपने सारे मन से और अपने सारे प्राण से, और अपनी सारी बुद्धि से, और अपनी सारी शक्ति से प्रेम रखना। और दूसरी यह है, कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखना: इस से बड़ी और कोई आज्ञा नहीं' (पद - 30-31)। इस संदेश की मुख्य बात यह है कि अपने प्रभु परमेश्वर से प्रेमपूर्ण संबंध बनाए रख, जो कि आपके मन से शुरू होता है और दूसरों को प्रेम करने के रूप में बाहर आता है।
प्रभु कौन हैं? इन सब पहेली के बीच यह प्रश्न उभर कर आता है, 'यह मनुष्य खुद को क्या समझता है?' मंदिर में यीशु उन्हें मसीह के आने के पूर्वानुमान के बारे में चुनौती देते हुए बाज़ी पलट देते हैं ('मसीहा' पद - 35)।
वह भजन संहिता 110 का उद्धरण करते हुए उनसे प्रश्न पूछते हैं। वह इस विचार को चुनौती देते हैं कि मसीहा दाऊद के वंशज से एक राजा होगा। वह दाऊद का पुत्र नहीं होगा, बल्कि वह दाऊद का प्रभु होगा (मरकुस 12:35-37अ)।
अब हम जानते हैं कि यीशु ही 'प्रभु' हैं। पूरे दिल से प्रभु से प्रेम करने की आज्ञा का अर्थ है अपने पूरे दिल से यीशु से प्रेम करना। इसे अपने जीवन की सबसे पहली प्राथमिकता बनाइये।
यीशु को विधि सम्मत या शब्दार्थ की परवाह नहीं थी, बल्कि आत्मा के व्यवस्था की परवाह थी। वह बाहरी रूप रंग की परवाह नहीं करते, बल्कि हृदय की।
3. अपने दिल पर ध्यान केंद्रित करें
मरकुस 12:38-40
खुद के बारे में कहते हुए, मैंने पाया कि कपट मेरे जीवन के लिए हमेशा खतरनाक रहा है। यह पदवी, मंच, शीर्षक, और सम्मान पाने के लिए चिंता करने के बारे में है। और लोगों को प्रभावित करने के लिए प्रार्थना करने के बारे में हमें सावधान रहना होगा, इसके बजाय हम दिल से प्रार्थना करें।
यीशु अपने दिनों के लीडर्स की निंदा करते हैं, उनके दिल साफ नहीं थे। वे अपने हृदय के बजाय बाहरी रूप रंग के बारे में ज़्यादा परवाह करते थे। वह कहते हैं, 'शास्त्रियों से चौकस रहो, जो लम्बे वस्त्र पहने हुए फिरते। और बाज़ारों में नमस्कार, और आराधनालयों में मुख्य - मुख्य आसन और जेवनारों में मुख्य - मुख्य स्थान भी चाहते हैं। वे विधवाओं के घरों को खा जाते हैं, और दिखाने के लिये बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हैं, ये अधिक दण्ड पाएंगे' (पद - 38-40)।
ये सभी बातें लोगों से प्रेम करने और उनसे सम्मान प्राप्त करने के बीच के फर्क को दर्शाती हैं। लेकिन परमेश्वर आपकी हैसियत और 'दिखावे' की परवाह नहीं करते (पद - 40)। वह हमारे हृदय की परवाह करते हैं।
4. दिल से दीजिये
मरकुस 12:41-44
यीशु आपके जेब के आकार की परवाह नहीं करते। वह आपके दिल की परवाह करते हैं।
यीशु ने पुराने रीति - रिवाजों का विरोध किया जिसमें परमेश्वर के लिए दी गई बड़ी भेंट, छोटी भेंट भी ज़्यादा मायने रखती थी। उन्होंने हमें बताया कि केवल धनी मनुष्य ही नहीं बल्कि गरीब मनुष्य भी भेंट देने के द्वारा परमेश्वर को प्रसन्न कर सकते हैं। वह कहते हैं धनी मनुष्य के द्वारा गरीब की तुलना में अत्यधिक धन दिया जाना पर्याप्त नहीं है। यीशु उदारता से देने वाले हृदय को देख रहे थे।
हम क्या देते हैं और हम जिस तरह से देते हैं, वह हमारे हृदय को प्रतिबिंबित करता है। वास्तव में यीशु धनी लोगों की निंदा नहीं करते जो बड़ी रकम देते हैं। बल्कि वह कहते हैं कि विधवा स्त्री जिसने 'तांबे के दो सिक्के दिये थे, जिसकी कीमत चंद पैसे थे' (पद - 42), उसका मूल्य दूसरों से भी ज़्यादा है।
यीशु उसका हृदय देखते हैं और वास्तव में 'मन्दिर के भण्डार में डालने वालों में से इस कंगाल विधवा ने सब से बढ़कर डाला है।
“क्योंकि सब ने अपने धन की बढ़ती में से डाला है, परन्तु इस ने अपनी घटी में से जो कुछ उसका था, अर्थात अपनी सारी जीविका डाल दी है' (पद - 43-44)।
प्रार्थना
लैव्यव्यवस्था 13:1-59
गंभीर चर्मरोगों के बारे में नियम
13यहोवा ने मूसा और हारून से कहा, 2 “किसी व्यक्ति के चर्म पर कोई भयंकर सूजन हो सकती है, या खुजली अथवा सफेद दाग हो सकते हैं। यदि घाव चर्मरोग की तरह दिखाई पड़े तो व्यक्ति को याजक हारून या उसके किसी एक याजक पुत्र के पास लाया जाना चाहिए। 3 याजकों को व्यक्ति के चर्म के घाव को देखना चाहिए। यदि घाव के बाल सफेद हो गए हों और घाव व्यक्ति के चर्म से अधिक गहरा मालूम हो तो यह भयंकर चर्म रोग है. जब याजक व्यक्ति की जाँच खत्म करे तो उसे घोषणा करनी चाहिए कि व्यक्ति अशुद्ध है।
4 “कभी कभी किसी व्यक्ति के चर्म पर कोई सफेद दाग हो जाता है किन्तु दाग चर्म से गहरा नहीं मालूम होता। यदि वह सत्य हो तो याजक उस व्यक्ति को सात दिन के लिए अन्य लोगों से अलग करे। 5 सातवे दिन याजक को उस व्यक्ति की जाँच करनी चाहिए। यदि याजक देखे कि घाव में परिवर्तन नहीं हुआ है और वह चर्म पर और अधिक फैला नहीं है तो याजक को और सात दिन के लिए उसे अलग करना चाहिए। 6 सात दिन बाद याजक को उस व्यक्ति की फिर जांच करनी चाहिए। यदि घाव सूख गया हो और चरम पर फैला न हो, तो याजक को घोषणा करनी चाहिए कि व्यक्ति शुद्ध है। वह केवल एक खुरंड है। तब रोगी को अपने वस्त्र धोने चाहिए और फिर से शुद्ध होना चाहिए।
7 “किन्तु यदि व्यक्ति ने याजक को फिर अपने आपको सुद्ध बनाने के लिए दिखा लिया हो और उसके बाद चर्मरोग त्वचा पर अधिक फैलने लगे तो उस व्यक्ति को फिर याजक के पास आना चाहिए। 8 याजक को जाँच करके देखना चाहिए। यदि घाव चर्म पर फैला हो तो याजक को घोषमा करनी चाहिए कि वह व्यक्ति अशुद्ध है अर्थात् उसे कोई भयानक चर्मरोग है।
9 “यदि व्यक्ति को भयानक चर्मरोग हुआ हो तो उसे याजक के पास लाया जाना चाहिए। 10 याजक को उस व्यक्ति की जाँच करके देखना चाहिए। यदि चर्म पर सफेद दाग हो और उसमे सूजन हो, उस स्थान के बाल सफेद हो गए हों और यदि वहाँ घाव कच्चा हो 11 तो यह कोई भयानक चर्मरोग है जो उस व्यक्ति को बहुत समय से है। अत: याजक को उस व्यक्ति को अशुद्ध घोषित कर देना चाहिए। याजक उस व्यक्ति को केवल थोड़े से समय के लिए ही अन्य लोगों से अलग नहीं करेगा। क्यों? क्योंकि वह जानता है कि वह व्यक्ति अशुद्ध है।
12 “यदि कभी चरमरोग व्यक्ति के सारे शरीर पर फैल जाए, वह चर्मरोग उस व्यक्ति के चरम को सिर से पाँव तक ढकले, 13 और याजक देखे कि चर्मरोग पूरे शरीर को इस प्रकार ढके है कि उस व्यक्ति का पूरा शरीर ही सफेद हो गया है तो याजक को उसे शुद्ध घोषित कर देना चाहिए। 14 किन्तु यदि व्यक्ति का चरम घाव जैसा कच्चा हो तो वह शुद्ध नहीं है। 15 जब याजक कच्चा चर्म देखे, तब उसे घोषित करना चाहिए कि व्यक्ति अशुद्ध है। कच्चा चर्म शुद्ध नहीं है। यह भयानक चर्मरोग है।
16 “यदि चर्म फिर कच्चा पड़ जाये और सफेद हो जाये तो व्यक्ति को याजक के पास आना चाहिए। 17 याजक को उस व्यक्ति की जाँच करके देखना चाहिए। यदि रोग ग्रस्त अंग सफेद हो गया हो तो याजक को घोषित करन चाहिए कि वह व्यक्ति जिसे छूत रोग है, वह अंग शुद्ध है। सो वह व्यक्ति शुद्ध है।
18 “हो सकता है कि शरीर के चर्म पर कोई फोड़ा हो। और फोड़ा ठीक हो जाय। 19 किन्तु फोड़े की जगह पर सफेद सूजन या गहरी लाली लिए सफेद और चमकीला दाग रह जाय तब चर्म का यह स्थान याजक को दिखाना चाहिए। 20 याजक को उसे देखना चाहिए। यदि सूजन चर्म से गहरा है और इस पर के बाल सफेद हो गये हैं तो याजक को घोषणा करनी चाहिए कि वह व्यक्ति अशुदध है। वह दाग भयानक चर्म रोग है। यह फोड़े के भीतर से फूट पड़ा है। 21 किन्तु यदि याजक उस स्थान को देखता है और उस पर सफेद बाल नहीं हैं और दाग चर्म से गहरा नहीं है, बल्कि धुंधला है तो याजक को उस व्यक्ति को सात दिन के लिए अलग करना चाहिए। 22 यदि दाग का अधिक भाग चर्म पर फैलता है तब याजक को घोषणा करनी चाहिए कि व्यक्ति अशुद्ध है। यह छूत रोग है। 23 किन्तु यदि सफेद दाग अपनी जगह बना रहता है, फैलता नहीं तो वह पुराने फोड़े का केवल घाव है। याजक को घोषणा करनी चाहिए कि व्यक्ति शुद्ध है।
24-25 “किसी व्यक्ति का चर्म जल सकता है। यदि कच्चा चर्म सफेद या लालीयुक्त दाग होता है तो याजक को इसे देखना चाहिए। यदि वह दाग चर्म से गहरा मालूम हो और उस स्थान के बाल सफेद हों तो यह भयंकर चर्म रोग है। जो जले में से फूट पड़ा है तब याजक को उस व्यक्ति को अशुद्ध घोषित करना चाहिए। यह भयंकर चर्म रोग है। 26 किन्तु याजक यदि उस स्थान को देखता है और सफेद दाग में सफेद बाल नहीं हैं और दाग चर्म से गहरा नहीं है, बल्कि हल्का है तो याजक को उसे सात दिन के लिए ही अलग करना चाहिए। 27 सातवें दिन याजक को उस व्यक्ति को फिर देखना चाहिए। यदि दाग चर्म पर फैले तो याजक को घोषणा करनी चाहिए कि व्यक्ति अशुद्ध है। यह भयंकर चर्म रोग है। 28 किन्तु यदि सफेद दाग चर्म पर न फैल, अपितु धुंधला हो तो यह जलने से पैदा हुई सूजन है। याजक को उस व्यक्ति को शुद्ध घोषित करना चाहिए। यह केवल जले का निशान है।
29 “किसी व्यक्ति के सिर की खाल पर या दाढ़ी में कोई छूत रोग हो सकता है। 30 याजक को छूत के रोग को देखना चाहिए। यदि छूत का रोग चर्म से गहरा मालूम हो और इसके चारों ओर के बाल बारीक और पीले हों तो याजक को घोषणा करनी चाहिए कि व्यक्ति अशुद्ध है। यह बुरा चर्मरोग है। 31 यदि रोग चर्म से गहरा न मालूम हो, और इसमें कोई काला बाल न हो तो याजक को उसे सात दिन के लिए अलग कर देना चाहिए। 32 सातवें दिन याजक को छूत के रोगी को देखना चाहिए। यदि रोग फैला नहीं है या इसमे पीले बाल नहीं उग रहे हैं और रोग चर्म से गहरा नहीं है, 33 तो व्यक्ति को बाल काट लेने चाहिये। किन्तु उसे रोग वाले स्थान के बाल नहीं काटने चाहिए। याजक को उस व्यक्ति को और सात दिन के लिए अलग करना चाहिए। 34 सातवें दिन याजक को रोगी को देखना चाहिए। यदि रोग चर्म मे नहीं फैला है और यह चर्म से गहरा नहीं मालूम होता है तो याजक को घोषणा करनी चाहिए कि व्यक्ति शुद्ध है। व्यक्ति को अपने वस्त्र धोने चाहिए तथा शुद्ध हो जाना चाहिए। 35 किन्तु यदि व्यक्ति के शुद्ध हो जाने के बाद चर्म में रोग फैलता है 36 तो याजक को फिर व्यक्ति को देखना चाहिए। यदि रोग चर्म में फैला है तो याजक को पीले बालों को देखने की आवश्यकता नहीं है, व्यक्ति अशुद्ध है। 37 किन्तु यदि याजक यह समझता है कि रोग का बढ़ना रुक गया है और इसमें काले बाल उग रहे हैं तो रोग अच्छा हो गया है। व्यक्ति शुद्ध है। याजक को घोषणा करनी चाहिए कि व्यक्ति शुद्ध है।
38 “जब व्यक्ति के चर्म पर सफेद दाग हों, 39 तो याजक को उन दागों को देखना चाहिए। यदि व्यक्ति के चर्म के दाग धुंधले सफेद हैं, तो रोग केवल अहानिकारक फुंसियाँ है। वह व्यक्ति शुद्ध है।
40 “किसी व्यक्ति के सिर के बाल झड़ सकते है वह शुद्ध है यह केवल गंजापन है। 41 किसी आदमी के सिर के माथे के बाल झड़ सकते हैं। वह शुद्ध है। यह दूसरे प्रकार का गंजापन है। 42 किन्तु यदि उसके सिर की चमड़ी पर लाल सफेद फुंसियाँ हैं तो यह भयानक चर्म रोग है। 43 याजक को ऐसे व्यक्ति को देखना चाहिए। यदि छूत ग्रस्त त्वचा की सूजन लाली युक्त सफेद है और कुष्ठ की तरह शरीर के अन्य भागों पर दिखाई पड़ रही है 44 तो उस व्यक्ति के सिर की चमड़ी पर भयानक चर्मरोग है। व्यक्ति अशुद्ध है, याजक को घोषणा करनी चाहिए। 45 यदि किसी व्यक्ति को भयानक चर्मरोग हो तो उस ब्यक्ति को अन्य लोगों को सावधान करना चाहिए। उस व्यक्ति को जोर से ‘अशुद्ध! अशुद्ध! कहना चाहिए, उस व्यक्ति के वस्त्रों को, सिलाई से फाड़ देना चाहिए उस व्यक्ति को, अपने बालों को सँवारना नहीं चाहिए और उस व्यक्ति को अपना मुख ढकना चाहिए। 46 जो व्यक्ति अशुद्ध होगा उसमें छूत का रोग सदा रहेगा। वह व्यक्ति अशुद्ध है। उसे अकेले रहना चाहिए। उनका निवास डेरे से बाहर होना चाहिए।
47-48 “कुछ वस्त्रों पर फफूँदी लग सकती है। वस्त्र सन का या ऊनी हो सकता है। वस्त्र बुना हुआ या कढ़ा हुआ हो सकता है। फफूँदी किसी चमड़े या चमड़े से बनी किसी चीज पर हो सकती है। 49 यदि फफूँदी हरी या लाल हो तो उसे याजक को दिखाना चाहिए। 50 याजक को फफूँदी देखनी चाहिए। उसे उस चीज को सात दिन तक अलग स्थान पर रखना चाहिए। 51-52 सातवें दिन, याजक को फफूँदी देखनी चाहिए। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि फफूँदी चमड़े या कपड़े पर है। यह महत्वपूरण नहीं कि वस्त्र बुना हुआ या कढ़ा हुआ है। यह महत्वपूर्ण नहीं कि चमड़े का उपयोग किस लिए किया गया था। यदि फफूँदी फैलती है तो वह कपड़ा या चमड़ा अशुद्ध है। वह फफूँदी अशुद्ध है। याजक को उस कपड़े या चमड़े को जला देना चाहिए।
53 “यदि याजक देखे कि फफूँदी फैली नहीं तो वह कपड़ा या चमड़ा धोया जाना चाहिए। यह महत्वपूर्ण नहीं कि यह चमड़ा है या कपड़ा, अथवा कपड़ा बुना हुआ है या कढ़ा हुआ, इसे धोना चाहिए। 54 याजक को लोगों को यह आदेश देना चाहिए कि वे चमड़े या कपड़े के टुकड़ों को धोएं, तब याजक वस्त्रों को और सात दिनों के लिए अलग करे। 55 उस समय के बाद याजक को फिर देखना चाहिए। यदि फफूँदी ठीक वैसी ही दिखाई देती है तो वह वस्तु अशुद्ध है। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि छूत फैली नहीं है। तुम्हें उस कपड़े या चमड़े को जला देना चाहिए।
56 “किन्तु यदि याजक उस चमड़े या कपड़े को देखता है कि फफूँदी मुरझा गई है तो याजक को चमड़े या कपड़े के फफूँदी युक्त दाग को चमड़े या कपड़े से फाड़ देना चाहिए। यह महत्वपूर्ण नहीं कि कपड़ा कढ़ा हुआ है या बारीक बुना हुआ है। 57 किन्तु फफूँदी उस चमड़े या कपड़े पर लौट सकती है। यदि ऐसा होता है तो फफूँदी बढ़ रही है। उस चमड़े या कपड़े को जला देना चाहिए। 58 किन्तु यदि धोने के बाद फफूँदी न लौटे, तो वह चमड़ा या कपड़ा शुद्ध है। इसका कोई महत्व नहीं कि कपड़ा कढ़ा हुआ या बुना हुआ था। वह कपड़ा शुद्ध है।”
59 चमड़े या कपड़े पर की फफूँदी के विषय में ये नियम हैं। इसका कोई महत्व नहीं कि कपड़ा कढ़ा हुआ है या बुना हूआ है।
समीक्षा
5. अपने हृदय को पवित्र रखें
पुराने नियम ने जीवन के हर एक पहलू पर ध्यान दिया है जिसमे शुद्धता, स्वास्थय और स्वच्छता शामिल है। इसके परिणाम स्वरूप, हम पुराने नियम में होमबलि और बलिदान के अलावा इन व्यवस्थाओं के बारे में पढ़ते हैं जिन्हें इस अध्याय में स्थापित किया गया था। ये सभी नियम और व्यवस्था पवित्रता के बारे में थीं, हालांकि उनका उद्देश्य परमेश्वर को प्रसन्न करना और उनका अनुकरण करना था (लैव्यवयवस्था 11:44)। दूसरे शब्दों में, बाहरी रीति - करती रिवाजों द्वारा हृदय की आंतरिक बातों को उजागर करना था।
यीशु के समय में कई शास्त्री गलत बातों पर ज़ोर दिया करते थे। उनका मानना था कि अनेक नियमों का पालन करने के द्वारा पवित्रता पाई जा सकती है जिनका संबंध बाहरी व्यवहार और कार्यों से था, बजाय इसके कि उनका हृदय परमेश्वर की ओर आज्ञाकारी बना रहे।
यीशु ने बताया कि इन सब के अलावा कुछ और है जो ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है। जैसा कि हम आज के नये नियम के लेखांश में देखा, 'अपने सारे मन और सारी बुद्धि और सारे प्राण और सारी शक्ति के साथ परमेश्वर से प्रेम रखना और पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखना' (मरकुस 12:33)। पवित्रता बाहरी दिखावे का मामला नहीं है। यह हृदय का मामला है।
प्रार्थना
पिप्पा भी कहते है
मरकुस 12:31
यीशु ने कहा 'अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करो' (मरकुस 12:31)। मैं खुद की देखभाल कैसे करती हूँ? मुझे लगता है, अच्छी तरह से!!!
दिन का वचन
मरकुस – 12:30
" और तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन से और अपने सारे प्राण से, और अपनी सारी बुद्धि से, और अपनी सारी शक्ति से प्रेम रखना।"

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संदर्भ
नोट्स:
अमेरीकन हार्ट एसोसिएशन, 'लाइफ इज सिम्पल 7', http://www.heart.org/HEARTORG/Conditions/My-Life-Check---Lifes-Simple-7\_UCM\_471453\_Article.jsp#।VqvcnbSp8Rk \[Last accessed January 2016\]
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जिन वचनों को (एमएसजी MSG) से चिन्हित किया गया है उन्हें मैसेज से लिया गया है। कॉपीराइट © 1993, 1994, 1995, 1996, 2000, 2001, 2002. जिनका प्रयोग एनएवीप्रेस पब्लिशिंग ग्रुप की अनुमति से किया गया है।